मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

व्यंग्य हाथ की सफाई की बात



व्यंग्य
हाथ की सफाई की बात
दर्शक
       एक होता है चुनाव चिन्ह। जो लोग मतदान के अधिकार का प्रयोग अक्षरों के रास्ते करना नहीं जानते वे भी दूर से चुनाव चिन्ह देख कर उस पर मुहर लगाते रहे हैं और अब तब तक बटन दबा कर जब तक बकौल श्री लालू परसाद मशीन की चीं न बोल जाये, लोकतंत्र के महादान में अपना योगदान करते रहे हैं। अपना पढने वाला चश्मा घर भूल आने वाले साक्षर लोग भी चुनाव चिन्ह देख कर मतदान कर सकते हैं। सो सभी चुनाव लड़ने वाले लोगों और उनकी पार्टी को एक चुनाव चिन्ह की आवश्यकता होती है। काँग्रेस के लोग कभी संघियों से ज्यादा चतुर होते थे सो उन्होंने उनकी पार्टी द्वारा मांगे जा सकने वाला चुनाव चिन्ह पहले ही उसी तरह हथिया लिया था, जिस तरह भाजपा ने 2014 के आम चुनाव में काँग्रेस के प्रत्याशियों को हथिया लिया था। तब गौवंश से जुड़ी दो बैलों की जोड़ी उनका चुनाव चिन्ह था। तब खेती भी हल बैलों से होती थी इसलिए ज्यादातर लोग बैलों को पहचानते भी थे। आज तो बैल के नाम पर उन्हें शेयर बाज़ार का फनफनाता सांड़ नजर आता है। कुछ साल बाद उन्हें अपना चुनाव चिन्ह बदलने की जरूरत पड़ी तब भी उन्होंने गौ माता को भाजपाइयों के हत्थे नहीं चढने दिया और अपना चुनाव चिन्ह गाय व बछड़ा बना लिया। बछड़ा भी दूध पीता हुआ था जैसे काँग्रेस के लोग सरकार रूपी गाय का दूध पीते रहते बड़े हुये हैं। कुछ वर्षों बाद काँग्रेस को फिर से चुनाव चिन्ह बदलना पड़ा तो उन्होंने अपना चुनाव चिन्ह हाथ के पंजे को बना लिया जिसमें कभी बहुत स्पष्ट भाग्य रेखा हुआ करती थी। एक बार इन्दिरा गाँधी ने बताया था कि देश के लोग कितने नासमझ हैं, जब मैंने उनसे हाथ के पंजे पर मुहर लगाने की अपील की तो उन्होंने हमारी बात तो मानी और हाथ के पंजे पर मुहर लगायी पर वह मतदान पत्र पर बना हाथ का पंजा नहीं था अपितु उन्होंने अपने हाथ के पंजे पर मुहर लगा ली थी।
सो इसी गति से हमारा लोकतंत्र आगे बढता भया और बढते बढते भाजपा ने हाथ की सफाई कर दी। उन्होंने यह हाथ की सफाई भी हाथ की सफाई दिखाते हुए की। जैसे सारे जादूगार हाथ की सफाई दिखा कर चीजों को गायब कर देते हैं वैसे ही उन्होंने काँग्रेस को साफ कर दिया। वे जान गये थे कि अगर जेब साफ करना है तो हाथ की सफाई के साथ ध्यान बँटाने का खेल खेलना होता है। जैसे टिकिट खिड़की पर लगी लम्बी लाइन में जेब कतरों का कोई साथी कहता है कि अरे मेरी तो जेब कट गयी तो लाइन में लगे सारे लोगों का हाथ अपने अपने बटुए वाली जेब पर जाता है जिसे जेबकतरे के लाइन से बाहर खड़े साथी देख लेते हैं और सुपात्र के पीछे लग जाते हैं। सो हमारी वर्तमान सरकार भी लगातार ध्यान बँटाने में लगी हुयी है। कभी इस मुँह से तो कभी उस मुँह से अपान वायु निकाल रहे हैं और लोगों का ध्यान दूसरी तरफ मोड़ देते हैं।
हमारे सही जन्मतिथि वाले जनरल ने किसानों की ज़मीन अधिग्रहण के सवाल और मौसम की मार के बाद मुआवजा मार लेने की आवाज दबाने के लिए सीधे मीडिया को वह कह दिया जो वो सुनना नहीं चाहता था। सो उसने अपना सारा ध्यान यह सिद्ध करने में लगा दिया कि वो, वो नहीं है जो उसे बतलाया जा रहा है। आज से पचास साल पहले एक फिल्म आयी थी जिसमें एक गाना था- औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया, जब जी चाहा कुचला मचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया..........। जब इसी मीडिया ने कड़कड़े नोटों के बदले इस सरकार को पैदा होने में मदद दी तो अब कैसे कह सकते हैं कि वो, वो नहीं है। कभी खुद को मोदीजी का खास आदमी बताते हुए हाफिज सईद का साक्षात्कार लेने के नाम पर भेंट करने वाले वैदिक ज्ञानी कह रहे हैं कि सभी वैसे नहीं हैं और कुछ की समझ तो देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी ज्यादा है। जाहिर है कि वे खुद को इसी श्रेणी में गिनते होंगे, तभी तो उन्होंने पाकिस्तान में खुद को पी एम का खास बताया था।
राजनीति में प्रतिशत का बहुत महत्व होता है सो मंत्रीजी ने भी वैदिकजी की बात मानते हुए कह दिया कि उनका मतल्ब सभी पत्रकारों से नहीं था वे तो केवल दस प्रतिशत पत्रकारों के लिए कह रहे थे। यह बयान की कला है। इससे हर पत्रकार खुद को दस प्रतिशत में मानकर शेष को नब्बे प्रतिशत का कह सकता है और इस तरह कोई भी प्रैस्टीट्यूट नहीं रह जाता और सभी हो जाते हैं। सिंह साहब राजनीति की कला सीखते जा रहे हैं। हाथ की सफाई। बहरहाल प्रतिशत कुछ भी हो पर जिन मीडिया वालों ने रजाई ओढ कर घी पिया है उन्हें समझ लेना चाहिए कि ज्यादा चूं चपड़ करने पर जाते जाते उनकी जानकारी भी सार्वजनिक हो सकती है।

        

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

व्यंग्य कविताओं की बेतरतीब कौंध








व्यंग्य
कविताओं की बेतरतीब कौंध
दर्शक
आदमी जब पगला जाता है तो कहते हैं कि उसका दिमाग तब भी काम करता रहता है, बस उसके विचारों का क्रम टूट जाता है। वह थैले में टमाटरों और अंडों के ऊपर आलू प्याज रखने लगता है। यह क्रम खास और आम आदमी दोनों के साथ होता है इसलिए दर्शक के दिमाग में अगर बेतरतीब ढंग से कविताएं कौंध रही हों तो उसके आम या खास होने में कोई फर्क नहीं पड़्ता। अब कोई इसे आम आदमी पार्टी से जोड़ कर देखे तो उसके क्रम भंग होने के प्रति सहानिभूति ही व्यक्त की जा सकती है और वह दर्शक के प्रति सहानिभूति व्यक्त कर सकता है। सुप्रसिद्ध दार्शनिक हरी राम चौहान के शब्दों में कहा जाये तो – पागल की ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है, उसे सारी दुनिया पागल समझती है और वह सारी दुनिया को पागल समझता है।
अब ये सुप्रसिद्ध दार्शनिक हरी राम चौहान कौन थे यह इस समय याद नहीं आ रहा। पर कविताएं याद आ रही हैं।   
सबसे पहले अपने समय के प्रगतिशील कवि मैथली शरण गुप्त की पंक्तियों की याद आयी तो सुनायी दिया-
कोई पास न रहने पर भी जन मन मौन नहीं रहता
आप आप की सुनता है वह आप आप से है कहता
मुकुट बिहारी सरोज की पंक्तियां याद आयीं कि-
जिनके पाँव पराये हैं, जो मन से पास नहीं
घटना बन सकते हैं वे लेकिन इतिहास नहीं
अचानक दुष्यंत कुमार याद आ गये-
अब रिन्द बच रहे हैं, जरा तेज रक्श हो
महफिल से उठ लिये हैं नमाज़ी तो लीजिए
फिरता है कैसे कैसे खयालों के साथ वो
इस आदमी की ज़ामा तलाशी तो लीजिए
बलवीर सिंह रंग याद आये तो सुनायी दिया –
आग पानी हुई, हुई न हुई
मेहरबानी हुई, हुई न हुई
कौन जाने फिजाये ज़न्नत में
ज़िन्दगानी हुई, हुई न हुई
सरफिरे दिल के बादशाहों की
राजधानी हुई, हुई न हुई  
********
प्रस्थान हो रहा है, पथ का पता नहीं है
नीरज जी कहने लगे –
जिसमें जितनी आग भरी है
उसमें उतना पानी है
जिसमें जितना पागलपन है
वह उतना ही ज्ञानी है
एक पकिस्तानी शायर का शे’र याद आया पर उसका नाम याद नहीं आया-
शहर के दुराहे पर एक शख्स देखा था
जाने क्या हवाओं पर उंगलियों से लिखता था
रात बन्द कमरे में उसने खुदकुशी कर ली
सारे शहर में जिसके कहकहों का चर्चा था
अब आप समझ लीजिए कि आम आदमी के दिमाग में जब आम आदमी पार्टी का सम्मेलन चलने लगता है तो उसके दिमाग का क्या हाल हो जाता है।



मंगलवार, 17 मार्च 2015

व्यंग्य आँखों के लिए खराब समय



व्यंग्य
आँखों के लिए खराब समय
दर्शक
काका हाथरसी की एक कविता है- ईश्वर की भूल। इस कविता में वे ईश्वर की भूलें गिनाते हैं, जिनमें से एक यह है कि-
मुख मण्डल पर दोनों आँखें पास पास ही फिट कर दी हैं,
एक आँख आगे दे दी थी
एक आँख पीछे दे देते
तो क्या कुछ घाटा हो जाता
सर पर कोई चपत मार कर भाग जाए
तो क्या कर लोगे!
       अब का ज़माना आँखों के लिए बहुत बुरा है। सरकारें वैसे तो वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइजेशन से अनुदान लेने के लिए अन्धत्व निवारण के विभाग चलाती हैं किंतु वे चाहती यह हैं कि जनता सच को न देखे। गुलाम अली एक ग़ज़ल गाते हैं जिसकी एक पंक्ति है- तुम्हारा देखना देखा न जाये। सरकारों को भी लोगों का देखना पसन्द नहीं आता वे भी यही चाहती हैं कि लोग देखना बन्द कर दें। एक प्रधानमंत्री तो ऐसे हुए हैं जिनका तकिया कलाम ही था कि- हम देख रहे हैं, हमने देखा, हम देखेंगे आदि। इसका परोक्ष अर्थ था कि उल्लू के पट्ठो, हम तो देख रहे हैं तू तो अपनी आँखें मूंद ले।
गाँधीजी भी जापान की एक मूर्ति के हवाले से सन्देश देते थे कि बुरा न देखने के लिए तीन बन्दरों की मूर्ति के उस एक बन्दर की तरह आँखें बन्द कर लेना चाहिए। अरे भाई जब आँखें बन्द कर लोगे तो न अच्छा दिखाई देगा, न बुरा। अच्छे-बुरे का फैसला तो देखने सोचने के बाद ही हो सकता है।
पहले भी शासकों के एजेंट जो धार्मिक वेशभूषा में फिरते थे, लोगों को समझाते थे कि ईश्वर खुली आँखों से दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि जब भी कोई ईश्वर को देखने का पाखण्ड करता नजर आता है, उसके नेत्र मुंदे होते हैं।
खुली आँखों से सच दिखाई देता है और जो सत्य नहीं है वह बन्द आँखों से ही दिखाई देगा।
अब के शासकों के संकट बहुत ज्यादा हैं। एक ओर तो जनता ने धार्मिक एजेंटों पर भरोसा करना बन्द कर दिया है क्योंकि उन में से कुछ तो उनके असल कारनामे देख लिए जाने के कारण खुद ही जेलों में बन्द कर दिये गये हैं, दूसरी ओर जनता की निगाहें कुछ ज्यादा ही चौकन्नी हो गयी हैं। इसलिए सरकारों ने अन्धत्व बढाने के विभाग खोल दिये हैं जिनका नाम जनसम्पर्क विभाग रख दिया है। इन विभागों का काम जनता की खबर देखू आँखों में विज्ञापन की धूल झौंकना है। जिसको जितना ज्यादा दिखाई देता है उसकी आँखों को उतनी ज्यादा धूल की जरूरत होती है। जैसे ही स्वास्थ विभाग की नाकामियों से स्वाइन फ्लू ने हजारों जानें लेना शुरू कर दीं वैसे ही अखबारों को सरकारों के फुल पेज के विज्ञापन जारी होना शुरू हो गये। इन विज्ञापनों में सूचना कम होती है पर नेता जी का बड़ा सा थोबड़ा इतना फैला रहता है कि अखबार पर खाने के लिए पराठां रखने के बाद अचार भी उनके थोबड़े से बाहर नहीं जा पाता। खबरें पढना बन्द करो थोबड़ा देखो। जैसे पुलिस वालों का अपराध कम करने का तरीका होता है कि रिपोर्टें ही कम से कम लिखी जायें, वैसे ही विज्ञापन पाने के बाद अफरे हुए अखबार बड़े गर्व से कहते हैं कि हम नकारात्मक खबरें नहीं देते। जिन्हें आँखें खोलने का काम करना चाहिए वे आँखें मूंदने का काम कर रहे हैं। जिन्हें व्यापम का सच बताना चाहिए वे मलाई खाकर सकारात्मक खबरें बनाने में लगे हैं।
        सच्चाई न देखो- को -बुरा न देखो- कहा जा रहा है। गाँधी जी का कोई भी बन्दर यह नहीं कहता कि बुरा मत करो, बस न देखो, न सुनो, और न कुछ बोलो।  
भागलपुर में कभी पुलिस ने कथित अपराधियों की आँखों में तेजाब डालने का काम किया था जिसे गंगाजल कहा जाता था। आजकल विज्ञापनजल डाला जा रहा है जिसे डलवाने के लिए अपने को जनता का प्रहरी, जनता की आवाज बताने वाले अखबार लाइन लगाये खड़े रहते हैं।     

व्यंग्य शांतता, पप्पू चिंतनरत आहे



व्यंग्य
शांतता, पप्पू चिंतनरत आहे
दर्शक
       कभी कभी पुराने लोगों की बातें भी अचानक असर कर जाती हैं। प्राचीन कवि कह गये हैं-
बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय
काम बिगारे आपनौ, जग में होत हँसाय
       पप्पू के दिमाग में एक रात अचानक ये पंक्तियां कौंध गयीं और उसे लगा कि उसकी असफलता के पीछे शायद यही कारण है कि उसने विचार नहीं किया। अगर बाई द वे कभी कुछ करने का अवसर आ गया तो तो चिंतन कहाँ हैं। फिर वह सो नहीं सका। उसे लगा कि चिंतन करना चाहिए। अब सवाल था कि चिंतन कैसे करना चाहिए, काहे का करना चाहिए, किस समय करना चाहिए, कितना करना चाहिए, कब करना चाहिए, कहाँ करना चाहिए........? उसे चिंतन से सम्बन्धित ढेर सारे सवालों ने चिंतन में डाल दिया।
चिंतन में मुद्रा की भी बड़ी भूमिका होती है। मैं बता दूं कि यहाँ मुद्रा से आशय स्वर्ण मुद्राओं वाली मुद्राओं से नहीं है। उसे अपने पिता के नाना का ख्याल आया जिनके ढेर सारे फोटो उसने चिंतन वाली मुद्रा में ही देखे थे। वे तीन उंगलियां मोड़े कुहनी को मेज पर टिका कर एक खड़ी उंगली को गाल पर टिकाये चिंतन मुद्रा में नजर आ रहे थे। कुछ लेखकों के चित्रों का भी खयाल आया जो ऊपर की ओर देखते हुए चिंतन रत थे, गोया ऊपर वाले से सीधे साक्षात्कार कर रहे हों या सोच रहे हों कि कहीं छत तो नहीं गिर जायेगी।
कुछ साधू-सन्यासी चिंतन करने के लिए हिमालय की ओर जाते थे। मुझे लगता है कि पहाड़ पर चिंतन करने का कारण अगर ठंडक में मच्छरों का कम होना नहीं होता होगा तो यह भी हो सकता होगा कि वहाँ देवदार वृक्षों की तरह ऊंचे ऊंचे विचार ही आते होंगे। हो सकता है कि सादा जीवन उच्च विचार जैसे मुहावरे का जन्म भी ऐसे ही उच्च स्थल पर चिंतन रत विचारवान लोगों को देख कर हुआ होगा। हिमालय की ओर न जाकर चिंतन करने वालों के पास हमेशा डीएमके वालों जैसे विचार ही आते हैं।  
       पप्पू, राजकुमार सिद्दार्थ की तरह बिना बताये चिंतन के लिए निकल पड़े क्योंकि यशोधरा की तरह कोई यह कहने वाला भी नहीं था कि- सखि वे मुझ से कह कर जाते। सो उन्होंने किसी से नहीं कहा। उनके जिन अनुयायियों को कभी यह चिंता नहीं हुयी थी कि उनका नेता बिना चिंतन के ही नेतृत्व करने में जुता हुआ है वे तक परेशान होने लगे। वे जानते हैं कि उन्हें तो बस एक मूर्ति की जरूरत होती है जिसकी प्रतिष्ठा करके वे अपने मन्दिर में स्थापित कर दें। मूर्ति अगर चिंतन करने लगे तो उनका चिंतित होना तो बनता है। मूर्ति सामने होती तो कहते कि अपको चिंतन- विंतन करने की जरूरत नहीं वो तो हम सब कर लेंगे, आप तो विराजे रहो।
       पप्पू कहाँ पर चिंतन कर रहे हैं इसका पता तो लगता है कि सुब्रम्ह्यम स्वामी को भी नहीं लग पाया जिन्हें सुनन्दा पुष्कर की मौत से लेकर दुनिया के सारे रहस्यों को पता होता है। चिंतन की यही तो कला होती है कि आदमी अचानक ज्ञान से भरा हुआ प्रकट हो और मैदान में आकर धमाका कर दे। इसी लिए पुराने चिंतकों ने इसे रहस्य कहा है, और रहस्य रखा है। सच भी है अगर आदमी भीड़ भाड़ में चिंतन करने लगे तो क्या खाक चिंतन कर पायेगा बस भाड़ ही झौंकता रहेगा। लोग तो सोते हुए आदमी से भी पूछते हैं- भैय्या सो रहे हो क्या? और जब वह उत्तर देता है- हाँ, तो कह कर चले जाते हैं कि अच्छा है सोओ, सोओ। अगर टोकने टाकने वाले हों तो चिंतन सम्भव होता ही नहीं है। कुछ तो ऐसे कर्मठ सिंह होते हैं जो हर विचार पर एक ही बात कहते हैं कि यह तो ठीक है, पर किया क्या? ऐसे चिंतन विरोधियों से दूर जाने का सोच अच्छा है।
करो पप्पू करो खूब चिंतन करो।
दर्दमन्दाने मोहब्बत क्या करें
रोने धोने से भी आखिर जाएं क्या