सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

व्यंग्य आजादी और भीख

 

व्यंग्य

आजादी और भीख

दर्शक

मेरे पिता दो पंक्तियां दुहराते थे-

जो पर पदार्थ के इच्छुक हैं

वे चोर नहीं तो भिक्छुक हैं

भीख की यही परिभाषा है कि वह बिना परिश्रम के अर्जित की हुयी वस्तु होती है।

क्या कंगना को पद्मश्री कठिन परिश्रम से मिली थी या भीख में मिली थी? मैं मानता हूं कि कठिन परिश्रम से मिली होगी। इस श्रम का मूल्यांकन किस ने किया यह ज्ञात नहीं है। प्रतियोगिता में किस किस के नाम थे यह भी पता नहीं है। लगता है कि यह सम्मान उन्हें ट्वीटर पर चहकने के लिए ही मिला होगा। उन्होंने सुशांत सिंह की मौत को हत्या सिद्ध करने की कोशिश की ताकि भाजपा विरोधी महाराष्ट्र सरकार को बदनाम किया जा सके। ऐसा करते हुए उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को चुनौती भी दी कि जो उखाड़ सकते हो सो उखाड़ लो। उन्होंने भी जो उखड़ सकता था उसे उखड़वा दिया। इनाम में उन्हें कमांडो की सुरक्षा दी गयी। तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर चलने लगे। नकली मशीने घोड़े पर लक्ष्मीबाई की एक्टिंग करने वाली कंगना खुद को सचमुच की लक्ष्मी बाई समझने लगी।

लोकप्रियता की ये सरल विधियां उस उक्ति से जन्मी हैं कि बदनाम भी होंगे तो क्या नाम ना होगा! होगा! और जब उस पर इनाम मिलने लगे तो चस्का लग जाता है। चस्का बुरी चीज होती है। इसलिए कंगना ने गोडसे को गाँधी की पुण्यतिथि के दिन गोडसे को महापुरुष बताते हुए महिमा मंडन कर दिया तो जितनी बदनामे हुयी उतनी ही वह भाजपा वालों की निगाहों में चढ गयी। इसी क्रम में उसने आन्दोलनकारी किसानों को आतंकवादी बता दिया। भाजपा की निगाहों में चमकने के लिए यह काफी था। इसी ने उसकी पद्मश्री पक्की कर दी।

कंगना के उदय के साथ ही राखी सावंत का बाज़ार पिट गया और वह चर्चा से गायब हो गयी। ऐसी अभिनेत्रियों की लोकप्रियता जिन कारणों से होती है वे पुरस्कार लेते समय वैसे कपड़े नहीं पहनतीं जैसी पोषाक के लिए उन्हें पुरस्कार मिलता है। रामभरोसे कल्पना कर रहा था कि राष्ट्रपति से पुरस्कार लेने जाते समय वह क्या उतने ही कपड़े पहिन कर जायेगी जितने कपड़ों में फोटो खिंचवाती है। पर पाखंड तो पाखंड होता है, उस समय भारतीय संस्कृति याद आ जाती है जो केवल साड़ी में ही सुरक्षित रहती है।

पद्मश्री के बाद उन्हें गाँधी की हत्या से भी बड़ा कुछ करना था सो उसने पूरे आज़ादी के आन्दोलन पर थूकने का मन बना लिया। भाजपा जो काम परीक्षण के तौर पर करती है उसके लिए छुटभइयों को आगे कर देती है, जब आलोचना होने लगती है तो धीरे से पल्ला झाड़ लेते हैं। वे कभी ऐसे बयानों की आलोचना नहीं करते। पहले वरुण गाँधी भी मुसलमानों की दाढी से लोगों को डराने लगे थे और हाथ काटने की धमकियां देकर बड़े पद की उम्मीदें करने लगे थे, पर जब पद नहीं मिला तो उसी युक्ति के सहारे वे किसानों का पक्ष लेने लगे और कंगना के बयान पर सवाल करने लगे। दबाव की राजनीति ऐसी ही होती है।

रामभरोसे पूछ रहा था कि एक पहेली बताओ। अगर आज़ादी 2014 में मिली थी तो 1947 की भीख में क्या मिला था? जहाँ कुछ नहीं मिला हो तो भीख कैसी?       

व्यंग्य जीप पर सवार

 

व्यंग्य

जीप पर सवार

दर्शक

शरद जोशी के एक व्यंग्य और उसी पर आधारित एक संकलन का नाम है ‘जीप पर सवार इल्लियां’। इल्लियां काटती नहीं हैं, किंतु वह लिजलिजा सा प्राणी घिन पैदा करता है। भले ही उससे किसी बड़ी बीमारी के फैलने की खबर अभी तक नहीं सुनी गयी हो किंतु जिस फल, सब्जी, या अनाज में इल्लियां पड़ जाती हैं उसे फेंक ही दिया जाता है। उस घिन से बचने के लिए यह आर्थिक नुकसान सह लिया जाता है। शरद जोशी ने नौकरशाही और राजनीति के जिस वर्ग को घृणास्पद समझा उसे इल्लियों की उपमा दी।

तब से अब तक माहौल बहुत बदल गया है। अब जीप पर इल्लियां नहीं खूंखार घूमते हैं। जीप भी अब अपना रूप बदल कर फार्चूनर तक पहुंच गयी है। जिनका फार्च्यून दूसरे के भविष्य को रौंद सकता है वे सब के सब फार्चूनरों में दौड़ रहे हैं। इन ऊंची ऊंची जीपों के बड़े बड़े पहिए काले धन से अर्जित अकूत कमाई और अहंकार से चलते हैं। इन दैत्यों को किसान मजदूर कीड़े मकोड़े दिखते हैं। तिजोरियों में भरे काले धन के साथ साथ कानून उनकी जेब में रहता है और अदालतों को तो अपना निजी स्टाफ मान कर चलते हैं। और बकौल मुकुट बिहारी सरोज –

 कोई क्या सीमा नापे, इनके अधिकारों की

ये खुद जन्मपत्रियां लिखते हैं सरकारों की

इसलिए

ये जो कहें प्रमाण, करें वो ही प्रतिमान बने

इनने जब जब चाहा तब तब नये विधान बने


इन्हें ना पुलिस की परवाह है, ना कानून का डर। बकौल डा, के, बी, एल पाण्डेय -

कुछ कलाइयां हो गईं, इतनी सबल महान

छोटी पड़ गई हथकड़ी, बौने दण्ड विधान

 वे बर्बर, खूंखार पहले से चेतावनी देते हुए घूम रहे हैं और अदालतों द्वारा जंगल राज कहे जाने पर वे खुद को शेर समझने की पुष्टि मानते है। वे देश के मालिक हैं, जिसे चाहे रहने देंगे और जिसे चाहे बाहर कर देंगे।

जिन गाड़ियों से ये किसानों, मजदूरों को कुचलते हैं उसे उन्होंने शुभ महूर्त में खरीदा होता है और सुरक्षा के लिए पूजा पाठ कराके नींबू मिर्च बांधा होगा। अन्दर किसी देवी देवता की फोटो लगी होगी, जयकारा लिखा होगा। अगर किसी मजबूरीवश इन्हें किसी जाँच समिति के सामने उपस्थित होना पड़ जाये तो भी तारीख इनकी होती है, कि ये कब आयेंगे। ये कई कई मन्दिरों में पूजा पाठ कर के तिलक लगवा कर बादशाहों की तरह आते हैं। राफेल विमान तक पर नींबू मिर्च बाँधने के लिए फ्रांस तक जाने वाले खुद को रक्षा मंत्री कहते हैं और इसे परम्परा बताते हैं। उन्हें पता नहीं कि नींबू और हरी मिर्च हमारे देश में कब और कहाँ से आयी। मौखिक आलोचना तालिबानों की करेंगे पर दुराचरण उन से बढ कर करेंगे। नंगा झूठ बोलने में इनका कोई मुकाबला नहीं। दुष्यंत कुमार ने सही कहा है-

गजब है, सच को सच कहते नहीं हैं

कुरानो- उपनिषद खोले हुये हैं

 

व्यंग्य किसानों का भारत बन्द

 

व्यंग्य

किसानों का भारत बन्द

दर्शक

बचपन से ही पढते सुनते आये थे कि –

है अपना हिन्दुस्तान कहाँ वह बसा हमारे गाँवों में

नीरज जी ऐसे ही एक ग्रामीण को सम्बोधित करते हुए कहते हैं-

यह सड़क नहीं

तुम्हारे वास्ते है वह फुटपाथ

जहाँ आलू प्याज और अंडों के छिलके

पड़े हैं अपने आप

इसी फुतपाथ के तुम हो अधिकारी, बस,

क्योंकि तुमने चोरी को छोड़ कर मेहनत स्वीकारी है

हलों की नोक से, कुदाली की चोट से

चट्टानें तोड़ कर धरती संवारी है

इसीलिए कहता हूं, देख कर चलो, ए भाई जरा देख कर चलो,,,,,

गत 27 सितम्बर को उन्हीं गांवों में रहने वाले किसान गाँवों से निकल कर हाई वे पर आ गये और गाँवों ने उन हाई वेओं को जाम कर दिया जो एक महानगर से दूसरे महानगर को जोड़ते थे। ये महानगर जो गाँवों के किसानों द्वारा उगाये गये अनाज से उछलते हैं वे जाम हो गये थे, उनकी कारों के काफिले रुक गये थे। गांवों और किसानों को महानगरी सभ्यता अनपढ समझती है और उनकी सरलता को गंवारपन कह कर हीन दृष्टि से देखती रही है। वे मानते रहे हैं कि इन्हें तो किसी भी तरह से ठगा जा सकता है। भाषा के अभिजात्य से, कुतर्कों से, ताकत से, पुलिस की वर्दी से, और सिर फोड़ देने वाले डंडों से उनसे अपनी बात मनवायी जा सक्ती है। इस बार जब महानगर ने बदमाशी से, धोखे से किसानों को ठगने वले कानून पास करा लिये तो किसानों को विरोध करना पड़ा। वे समझते रहे कि हर बार की तरह वे पुलिस की वर्दी और डंडों से डर जायेंगे, गुस्से में आकर भिड़ जायेंगे तो फिर दमन का बहाना मिल जायेगा।

किंतु जिस गाँधी को उन्होंने तीन गोलियां चलवा कर मरवा दिया था, वह ना जाने कहाँ से पैदा हो गया। किसान बोले हम तो तुम्हारे रास्ते पर जम जायेंगे। तुम कितना भी हमला करो हम सहन करेंगे किंतु डरेंगे नहीं, भागेंगे नहीं। ठंड से, लू से, बरसात से, पानी की बौछारों से सैकड़ों किसानों ने जान दे दी किंतु बदले के लिए डंडे नहीं उठाये। बातचीत के लिए हमेशा तैयार रहे और अपना खाना साथ लेकर गये। खुद भी खया और सरकार के मंत्रियों को भी खिलाया। अपना पानी लाये जिसे डंडे फटकारने वाले पुलिस वालों को भी पिलाया। उन्होंने लाखों लोगों की सभा करके न केवल एकजुटता ही दिखायी अपितु सरकार की सबसे बड़ी ताकत साम्प्रदायिकता को भी हराया। हर हर महादेव के जबाब में अल्ला हो आकबर का नारा लगवाया। बदमाशी के लिए आये हुये गोदी मीडिया से बात करने से मना कर दिया व उसे उल्टे पैरों वापिस होने के लिए मजबूर कर दिया। धैर्य की परीक्षा दी और उसमें पास हुये। दुनिया भर में सरकार की थू-थू हुयी। दुनिया में जिसके भी पास गये उसने धिक्कारा और लिजलिजे मीडिया को गोदी में बैठाने पर व्यंग्य किया।

प्रैसवार्ता करके देश को यह भी नहीं बता सके कि क्या लेकर आये हैं, या फिर अपना सा मुँह लेकर चले आये।  दाढी थोड़ी सी कटवायी नाक ज्यादा कटवायी।

     

व्यंग्य चुनाव की छटपटाहट

 

व्यंग्य

चुनाव की छटपटाहट

दर्शक

विचार के साकार देखने की घटना मुहब्बत के किस्सों में पायी जाती थी। हो सकता है अब भी पायी जाती हो किंतु अब मुहब्बत दूर दूर तक देखने को नहीं मिलती, अब तो केवल नफरत नफरत और नफरत ही देखने को मिलती है। पर डाक्टर कहते हैं कि यह एक बीमारी होती है जब कोई अपने प्रिय या प्रशंसक को साकार महसूस करने लागता है, उससे बातचीत करता है। मुन्नाभाई फिल्म में मुन्नाभाई गाँधीजी से बात करता है, उनसे प्रेरणा ग्रहण करता है। कृष्ण काव्य में भी जब विरहिणी गोपिका की माँ उससे कहती है कि यह सुई दीवार में खोंप दो ताकि खो ना जाये तो वह कहती है कि यहाँ कहाँ दीवार है ? यहाँ पर तो कृष्ण ही कृष्ण हैं, मैं उनमें सुई कैसे घोंप दूं।

चुनावी पार्टियों में सुपर पार्टी भाजपा का भी आजकल यही हाल हो गया है। उसे चारों ओर चुनव ही चुनाव नजर आ रहे हैं और मजे की बात तो यह है कि पश्चिम बंगाल में बुरी तरह मुँह की खाने के बाद तो वह और भी बौरा गयी है। उसे चुनाव में होती हुई हार के अलावा और कुछ नजर ही नहीं आ रहा। दोष इंजन में है और उसने डिब्बे बदलने शुरू कर दिये हैं। शुरुआत उत्तराखण्ड से हुयी। पहले एक मुख्यमंत्री बदला, किंतु दूसरे ने सांस भी नहीं ले पायी थी, कुम्भ का हिसाब भी नहीं जोड़ पाया था कि उसे भी बदल दिया, तीसरा ला पटका। अब उसके पांव डगमगा रहे हैं कि जाने कब शतरंज के मोहरे की तरह कहाँ से उठा कर कहाँ रख दिया जाये। विधायक इतने मजबूर हैं कि मुँह पर मास्क के नीचे पट्टी बाँध कर रखते हैं कि कहीं आवाज ना निकल जाये। काम तो वैसे भी नहीं होता केवल अखबारों में विज्ञापन निकलवाने होते हैं कि यह कर दिया, वह कर दिया। इससे दोनों काम सध जाते हैं, एक ओर तो मुँह में टुकड़ा आ जाने से अखबार गुलाम हो जाते हैं तो दूसरी ओर आँखें मिचमिचाती हुई जनता सोचती है कि जब अखबार में विकास छप गया तो जरूर्‍ हुआ ही होगा, हमें ही नहीं दिखाई देता।

इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कोलकता के फ्लाई ओवर पर खड़े दिखने की फोटो बनवा कर विज्ञापन निकलवा दिया कि जनता की आँखों में तो अयोध्या के मन्दिर की नींव खुदने की धूल पड़ी हुयी है, उसे क्या दिखायी देगा। पर क्या करें, ताड़ने वाले कयामत की नजर रखते हैं। उन्होंने न केवल झूठ पकड़ लिया अपितु यह भी पता लगा लिया कि फ्लाई ओवर कहाँ का है। ‘ अश्वत्थामा हतो, नरो वा कुंजरो’ की संस्कृति वालों ने ‘ न ब्रूयात सत्यम अप्रियम ‘ के पहले भाग का पालन शुरू कर दिया है। वैसे हार की सम्भावनाओं को देखते हुए इन मुख्यमंत्री को भी हटाने की तैयारी पूरी हो गयी थी किंतु उन्होंने याद दिला दी कि उन्हें तो मजबूरी में मुख्यमंत्री बनाया गया था। अब वे जायेंगे तो सरकार को साथ ले जायेंगे। जिस सरकार में दो दो उपमुख्यमंत्री बनाने पड़ते हों वहाँ सरकार की मजबूती स्वयं ही प्रकट हो जाती है। पिछड़ा वर्ग सम्हालो तो ब्राम्हण विदकते हैं और ब्राम्हण को काँग्रेस से आयात करो तो पिछड़ा वर्ग, दलित वर्ग की पार्टियां ब्राम्हण सम्मेलन करने लगती हैं। ब्राम्हण वैसे भी किसी एक पार्टी के भरोसे नहीं रहे।

दलबदल से कर्नाटक में बनी सरकार के ईमानदार मुख्यमंत्री येदुरप्पा को हटाया तो वे अपनी जति के लिंगायत को ही मुख्यमंत्री बनवाने पर अड गये और मनवा कर ही माने। गुजरात में रूपाणी जो ठीक से ना ही कोरोना में मरने वालों की लाशें गिन पाये और ना ही मरीजों को गिन पाये। और तो और वे अखबारों को भी नहीं साध सके, तो उन्हें दैनिक वेतनभोगी की तरह शाम तक हिसाब कर लेने को कहा गया व एक नया मिट्टी का माधो तलाश लिया गया।

फिराक साहब से क्षमा याचना सहित शे’र यूं होता है-

बहुत पहले से हम कदमों की आहट जान लेते हैं

तुझे ये पराजय, हम दूर से पहचान लेते हैं       

 

व्यंग्य उठाईगीरे

 

व्यंग्य

उठाईगीरे

दर्शक

एक विवादास्पद बड़ी प्रापर्टी थी। कई भाइयों व बहिनों के बीच विरासत में मिली प्रापर्टी का विवाद था। कुछ भाई मर गये थे, तो विवादियों की संख्या में विस्तार करने के लिए उनके कई वारिस जीवित थे। बंटवारा नहीं हुआ था। जो हिस्सा जिसके कब्जे में था वह उसका उपयोग कर रहा था। कुछ ने अपने कब्जे के हिस्से को किराये  पर उठा दिया था। बंटवारे से पहले खरीदने वाले ग्राहक ही नहीं मिल पा रहे थे जो सही दाम दे सकें। एक भाई को पैसे की जरूरत पड़ी तो उसने अपने अधिकार वाली दुकान को किराये पर उठा दिया। एक चतुर वकील ने तरकीब सुझायी जिसके अनुसार उन्होंने किरायेदार से दुकान की कीमत के बराबर रकम का उधारनामा बनवाया जिसमें लिखवाया कि दो वर्ष के अन्दर अगर उधारी और ब्याज की रकम चुकता नहीं की गयी तो उसे दुकान को बेचने का अधिकार होगा। तय समय में रकम चुकता नहीं की गयी और किरायेदार ने अपने ही बेटे को दुकान बेच दी। भाइयों ने असहमति जताई तो सम्बन्धित ने कहा कि एक हिस्सा तो मेरा बनता है जब बंटवारा हो तो उसे मेरे हिस्से में से काट लेना। सब चुप हो गये क्योंकि वे बंटवारा करने की स्थिति में नहीं थे।

लगता है कि ऐसे ही चतुर वकील भारत सरकार के प्रधानमंत्री मोदीजी को भी मिल गये हैं जिन्होंने देश बेचने का उपाय उन्हें सुझा दिया है कि सारे संस्थानों को किराये पर उठा दो और मोटी रकम ले लो। किरायेदार प्रापर्टी खाली नहीं करेगा और इस तरह देश के लाभ देने वाले संस्थान बिक जायेंगे।

शाम को मय पी ली, सुबह को तौबा कर ली

रिन्द के रिन्द रहे हाथ से जन्नत ना गई

रामभरोसे सवाल कर रहा था कि कोई विभाग अगर नुकसान में चल रहा है तो प्राइवेट उसे क्यों खरीदेगा या कहें कि क्यों किराये पर लेगा और अगर लाभ में है तो सरकार क्यों किराये पर दे रही है? लगता है कि हाल यह होगा कि

माली आवत देख कर पहुअन करी पुकार

फूले फूले चुन लिए काल हमारी बार

सो फूले फूले चुन लिए जायेंगे और कुम्हलाये, मुर्झाये बाकी रहेंगे जिन्हें सरकार औने पौने दामों पर अपने यार दोस्तों को बेच देगी। रोचक है कि जिनको राहत इन्दौरी ने किरायेदर बतलाया था, वे खुद प्रापर्टी को किराये पर उठा रहे हैं।

आज जो साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे

किरायेदार हैं, जाती मकान थोड़ी है

पर, कुछ किरायेदार ऐसे भी होते हैं जिनके खून में व्यापार होता है और वे किराये के मकान को भी अपने बाप का हिन्दुस्तान समझ कर बेच देते हैं।

पुरानी फिल्म भाभी का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था, जिसके बोल थे-

ओ, पिंजरे के पंछी रे, तेर दरद ना जाने कोय

तूने तिनका तिनका चुन कर, नगरी एक बसाई

बारिश में तेरी भीगी पांखें, धूप में गरमी खाई

गम ना कर जो तेरी मेहनत तेरे काम ना आई

अच्छा है कुछ ले जाने से देकर ही कुछ जाना।

ये देश हुआ बेगाना।

देश को नीलामी पर चढा दिया गया है।     

व्यंग्य मार्शल ला वाला लोकतंत्र

 

 व्यंग्य

मार्शल ला वाला लोकतंत्र  

दर्शक

जब हम स्वतंत्रता की रजत जयंती की ओर बढ रहे थे तब ही उसका सबसे बड़ा हनन सामने आ रहा था। किसी शायर ने सही कहा है कि - 

बहुत दिनों से है ये मसअला सियासत का

कि जब जवान हों बच्चे तो कत्ल हो जायें

हमारी आज़ादी ऐसे ही लोगों के हाथों में पड़ गयी है। मुकुट बिहारी सरोज जी की कविता पूछती थी – क्योंजी ये क्या बात हुयी

ज्यों ज्यों दिन की बात की गई

त्यों त्यों रात हुयी

उम्मीद तो यह थी कि देश एक परिपक्व नेतृत्व के साथ परिपक्व लोकतंत्र की ओर बढता, किंतु सारा मामला ठगों के हथों में चला गया है। असफल नाटकों के गीत में सरोज जी लिखते हैं-

नामकरण कुछ और खेल का, खेल रहे दूजा

प्रतिभा करती गई दिखाई, लक्ष्मी की पूजा

असफल, असम्बद्ध निर्देशन, दृश्य सभी फीके

स्वयं कथानक कहता है, अब क्या होगा जीके

जन मन गण की जगह, अंत में गाया हर गंगे

राम करे दर्शक दीर्घा तक आ ना जायें दंगे

जिस लोकतंत्र को बनाना था, मजबूत करना था उसे दिन प्रति दिन कमजोर किया जा रहा है। धूमिल को कहना पड़ा था कि-

 हमारा लोकतंत्र,

सिनेमा हाल में रखी हुई उस बाल्टी की तरह है

जिस पर आग लिखा है और रेत भरी है,

मुक्तिबोध, जो है, उससे और बेहतर चाहते थे किंतु हो यह रहा है, जैसा कि एक बुन्देली कहावत में बदतर होती स्थिति के बरे में कहा गया है-

धी की आँख किया रुजगार

सोलह सौ के भये हजार

सदन के दिन, दिन प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं, विपक्षी सांसद तक शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा है, तो आम आदमी की क्या औकात! जो बोलने की कोशिश करते हैं, उन्हें मार्शल उठा कर फेंक रहे हैं । जाओ बाहर जाओ और बोल लो चाहे जितना बोलना हो। टुकड़खोर प्रैस विपक्ष की प्रैस कांफ्रेंस में आता ही नहीं, आता है तो समाचार नहीं बनाता, बनाता है तो सम्पादक छापता नही। और इसी तरह आज़ादी का स्वर्ण जयंती वर्ष आ रहा है जो आजादी को स्वर्ण भस्म में बदल देगा और उस राख को कोई व्यापारी बाबा बेचेगा।

एक ऐसे ही व्यापारी बाबा ने जो मूर्ख भक्तों को ही शिकार बनाता है क्योंकि वहाँ जमीन पहले से ही नम होती है, डाक्टरों से पंगा ले लिया। डाक्टरों ने उसे इंजेक्शन ठोकने की जगह उस पर केस ठोक दिया। वह बाबा जो बड़े बड़े सत्ताधीशों को सत्ता दिलवाने का दावा करता था किसी साध्वी की तरह कहा कि मैंने तीसरी आँख खोल दी तो इन डाक्टरों को भस्म कर दूंगा। डाक्टरों ने शांत चित्त से कहा कि बाबाजी तुम्हारी दूसरी आँख तो ठीक से खुलती नहीं है तीसरी क्या खोलोगे। तब से बाबा को ‘बस एक चुप सी लगी है [नहीं उदास नहीं] ।

 

 


 

व्यंग्य ईवीएम चुनाव

 

व्यंग्य

ईवीएम चुनाव

दर्शक

मशीन युग में जब सारे के सारे काम मनुष्य की जगह मशीनों से होने लगे हों तो चुनाव ही क्यों मनुष्यों पर अटके रहें, सो उसने अपना राजा खुद चुनने के लिए भी मशीन का निर्माण कर लिया। चूंकि मशीन का निर्माण भी मनुष्यों ने किया था इसलिए उसने इस बात की भी प्रोग्रमिंग कर दी कि किसे चुनना है। जब मशीन ही बना ली तो फिर दिमाग को क्यों तकलीफ दी जाये! कब किसको कितने वोटों से जीतना है, यह तय कर दिया गया। अब केवल मशीन पर अधिकार करना बाकी रह गया था। जिसके हाथ में मशीन उसके पक्ष में सरकार, इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि जिसके पक्ष की सरकार, उसी के हाथ में मशीन।

हम पाखंड में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते इसलिए दिखावे के लिए एक चुनाव आयोग भी बना डाला, जो निष्पक्ष दिखने की कोशिश करता रहता है और अब इस प्रयास में और ज्यादा नंगा होता जाता है।

वैसे चुनाव आयोग हमेशा से ऐसा नहीं रहा, इसमें कभी कभी शेषन जैसे लोग भी आते रहे जो इतना गुर्राते थे कि लोग उन्हें अल्शेषन कहने लगे थे जो एक पालतू पशु की किस्म होती है। नौकरी से रिटायर होने के बाद उन्होंने अपनी लोकप्रियता को आजमाना चाहा और सीधे राष्ट्रपति का चुनाव लड़ डाला, और हार गये। 2002 में एक लिंग्दोह साहब भी हुये थे, जिन्होंने गुजरात विधान सभा चुनाव स्थगित कर के दंगों को भुनाने की मोदी योजना पर पलीता लगाना चाहा। इससे मोदी जी के नथुने फड़कने लगे और लिंग्दोह साहब के धर्म, जाति ही नहीं उनके नाम का भी मजाक उड़ा कर गरियाने लगे। मोदीजी जानते थे कि उत्तेजना किसी भी तरह की हो, वह ज्यादा देर तक नहीं टिकती इसलिए वे गुजरात के नरसंहार के तुरंत बाद चुनाव चाहते थे वहीं दूसरी ओर लुटा पिटा अल्पसंख्यक समाज कुछ सांस लेना चाहता था। मोदी जी ने कहा कि वे सोनिया गांधी से चर्च में मिलते होंगे। चुनाव तो टल गये थे किंतु चुनाव परिणाम नहीं टले। यही वह समय था जब लोगों का चुनाव प्रणाली से विश्वास टूटना शुरू हो गया था। जब इतने नैतिक पतन के बाद भी चुनाव मशीन को ही जीतना है तो खाली पीली मुँह चलाने से क्या होगा? कभी हम लोग छात्र जीवन में चार्वक के नाम से कहने लगते थे-

पठतव्यं तो मरतव्यं, न पठतव्यं तो मरतव्यं

फिर दांत किटाकिट किं कर्तव्यं

वही अब भी कहा जाने लगा कि बटन भले ही किसी का दबाओ, वोट तो बीजेपी को ही जायेगा।

हमारी ईवीएम मशीनें भी बहुत आवारा हो गयी हैं। चुनाव के बाद उन्हें ले जाने को नियुक्त वाहन खराब हो जाता है और चुनाव का पीठाधीन अधिकारी जिस प्राइवेट वाहन को रोकता है, वह भाजपा उम्मीदवार का वाहन होता है जो अनजाने से उसी रास्ते पर निकल आता है और ईवीएम गाती हुयी निकल पड़ती है-

चली चली रे पतंग मेरी चली रे

चली बादलों के पार, होके डोर पै सवार

सारी दुनिया ये देख देख जली रे

      दूसरी तरफ टीएमसी वाले भी भाजपाइयों के दीदी जीजा जी हैं सो उन्होंने भी ईवीएम मशीनों को घर में पाल लिया। अब ईवीएम से निकला बहुमत जन मानस की भावनाएं व्यक्त नहीं करता ।