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बुधवार, 13 सितंबर 2017

व्यंग्य ‘डे’ का दिन और एमपी की झाँकी

व्यंग्य
‘डे’ का दिन और एमपी की झाँकी
दर्शक
कुछ सेवक ऐसे सेवक होते हैं, जो अपनी सेवा शर्तों के अनुसार तय शुदा काम और किये गये अनुबन्ध के काम तो नहीं करते पर इसके अलावा चौबीस घंटों में अठारह घंटे काम करने का दावा करते हैं, व भक्तों से इसके लिए जय जयकार कराते रहते हैं।
एक कहानी इस प्रकार है- एक बार जंगल में एक बन्दर को मंत्री चुन लिया गया। जब उसके पास एक शिकायत लेकर एक खरगोश आया तो उसने इस डाल से उस डाल पर और उस डाल से इस डाल पर लगातार छलांगे लगाना शुरू कर दिया। ऐसा करते करते जब काफी समय हो गया तो खरगोश को शक हुआ। उसने कहा कि हुजूर मेरे काम का क्या हुआ? बन्दर बोला काम हुआ या नहीं, पर मेरे प्रयास में कोई कमी हो तो बताओ! ऐसा कह कर वह बन्दर फिर से इस देश से उस देश........ क्षमा करें, इस डाल से उस डाल पर छलांगे लगाने लगा।
उसे अपने छप्पन इंची सीने के साथ अठारह घंटे काम जो करना था।
विवेकानन्द के दिये हुए ऎतिहासिक भाषण को 125 साल हो गये। यह भाषण इतने ही सालों से वैसे का वैसा ही है, न 124वें साल में बदला था न 160वें साल में बदलेगा भले ही उसके बहाने अपने मन की बात कहने वाले बदल जायें और भाषण की व्याख्याएं बदल जायें। छात्रों के हाकी मैच वाले लेख की तरह के एक लेख याद कर लो, जब भी किसी विषय पर लेख लिखने को कहा जाये तो कोई सन्दर्भ निकाल कर उसमें हाकी मैच पिरो दिया जाये क्योंकि हमें तो वही याद है। चाहे पिकनिक हो या ताजमहल की यात्रा हाकी मैच की जगह निकल ही आती है। विवेकानन्द के भाषण की जयंती पर भी प्रधानसेवक को सफाई की याद आ गयी और जेएनयू में हुये छात्रसंघ चुनाव में उनकी छात्र इकाई की पराजय के कारण कैम्पस की याद भी आ गई। यह याद नहीं आया कि पिछले सौ दिनों में सीवर की सफाई करते हुए देश में 39 लोग अकाल मौत मर गये। ये ऐसे सैनिक हैं जो बिना हथियारों, अर्थात सुरक्षा उपकरणों के सबसे बुरी मानी जाने वाली गन्दगी को अपने हाथों से साफ करते हैं। इन बहादुरों को शहीद का दर्जा भी नहीं दिया जा सकता।
हमारे प्रधानसेवक ने इसी अवसर पर कहा कि हम हर रोज कोई न कोई डे मनाते हैं, तो इसी तर्ज पर पंजाब डे, केरल डे, आदि क्यों नहीं मनाते। इस दिन हम उसी प्रदेश की तरह के कपड़े पहिनें, खाना खायें, सांस्कृतिक कार्यक्रम करें आदि।
उनकी इस बात को सुन कर राम भरोसे बहुत उत्साहित हो गया और भागा भागा मेरे पास आया। बोला हम एमपी डे मनायेंगे। उत्तर में मैंने अपनी औकात के अनुसार प्रतिक्रिया दी कि पहले एमएलए डे से शुरू करो। उसने माथा ठोक कर कहा कि एमपी यानि कि मध्य प्रदेश। मैंने कहा ठीक है प्रारूप बताओ। बोला कि दशहरा मैदान में एक मेला लगायेंगे जिसमें कई झांकिया होंगीं। पहली झाँकी व्यापम की होगी जिसमें पीएमटी से लेकर विभिन्न परीक्षाओं में इम्पोर्टेड बच्चे दूसरे के नाम से परीक्षा दे रहे होंगे। नेताओं के निजी सचिव और रिश्तेदार नोट गिन रहे होंगे, कुछ आत्महत्या कर रहे होंगे, कुछ को मार दिया जा रहा होगा। वगैरह। दूसरी झाँकी किसानों पर गोली चलाती बहादुर पुलिस की होगी तो तीसरी झाँकी जेल से भाग कर आत्मसमर्पण करने की कोशिश में मारे जा रहे कैदियों की होगी। तीसरी झाँकी अस्पताल में मोतियाबिन्द के आपरेशन के लिए आये मरीजों के अन्धे होकर जाने की होगी, तो चौथी झाँकी पेटलाबाद की होगी, पांचवीं झाँकी खाली पड़ी मानवाधिकार आयोग और लोकायुक्त की कुर्सियों की होगी। छठवीं झाँकी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की गौशाला की होगी, सातवी झाँकी ..................
अरे बस भी करो भाई कितनी झाँकियां निकालोगे! एमपी अजब है सबसे गज़ब है।  


गुरुवार, 12 मई 2016

व्यंग्य- डिग्री एक खोज- नरेन्द्र दामोदर दास

व्यंग्य
डिग्री एक खोज – नरेन्द्र दामोदर दास
दर्शक
राजस्थान सरकार ने स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में से जवाहरलाल नेहरू का पाठ हटा दिया है।
यह मोदी युग है। जवाहरलाल नेहरू विद्वान थे और लेखक थे, प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन में वे मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाये गये थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल में उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी थीं उनमें से एक का नाम था- भारत एक खोज। नरेन्द्र मोदी को जब इमरजैंसी में जेल जाने का मौका आया तो पहले बताया गया था कि वे सन्यासी का रूप धर कर हिमालय चले गये थे, पर अब सामने आ रहा है कि उन्होंने इस दौरान डिग्रियां प्राप्त करने के लिए अध्ययन भी किया जिसके फलस्वरूप दिल्ली विश्व विद्यालय से तृतीय श्रेणी में बी.ए. किया। शायद अपने प्रधानमंत्री की श्रेणी की इसी शर्म के कारण विश्व विद्यालय ने उनकी डिग्री के बारे में बताने से इंकार कर दिया होगा, पर जिन खोजा तिन पाइयां वाले आर टी आई कार्यकर्ताओं ने अंततः उगलवा ही लिया। मोदीजी अगर लेखक होते तो वे लिखते, ‘डिग्री एक खोज’ ।  
पहले डिग्री न दिखाने का कोई कारण न बताते हुए और उत्तीर्ण होने के वर्ष में नजर आती भूल के बारे में विश्वविद्यालय ने कहा कि यूनीवर्सिटी से छोटी मोटी गल्तियां हो जाती हैं। उनकी पूरी शिक्षा से सम्बन्धित अंक सूची के कम्प्यूटराइजेशन, उत्तीर्ण होने के वर्ष, स्नातकोत्तर डिग्री में विषय आदि के बारे में भक्तों का कहना है कि भगवान पर शंका नहीं करना चाहिए। उसके सामने आँखें ही नहीं खोलना चाहिए।
माना तुम्हारी दीद के काबिल नहीं हूं मैं [यहाँ दीद की जगह डिग्री पढें]
पर मेरा शौक देख, मेरा इंतजार देख
उन्हें पत्नी बच्चों की माया पसन्द नहीं थी, नौकरी करनी नहीं थी, पर डिग्री चाहिए थी।
देश में एक बड़े व्यंग्य कवि हुए हैं स्व. श्री वासुदेव गोस्वामी, जो मध्य प्रदेश के दतिया में रहते थे। उन्होंने एक घटना सुनायी थी। एक व्यक्ति पढ नहीं पाया था पर उसके एक परिचित ने कहा कि अगर तुम्हारे पास बी ए की डिग्री होती तो मैं तुम्हारी नौकरी लगवा देता। उसे पता था कि राजधानी में कहीं कोई व्यक्ति नकली डिग्री बेचता है सो वह अपनी जमा पूंजी समेट कर राजधानी चला गया और बिल्कुल असली नजर आने वाली बी.ए. की डिग्री खरीद कर लाया जिसके सहारे उसकी नौकरी लग गई, आगे प्रमोशन भी हो गया। कुछ वर्ष बाद अगले प्रमोशन को ध्यान में रख कर उसने सोचा कि क्यों न एम.ए. कर लिया जाय, सो उसने एम.ए. का फार्म भर दिया। उस फार्म की स्क्रूटनी में उसकी बी.ए. की नकली डिग्री पकड़ में आ गई। पहले तो वह घबराया, पर उसकी नौकरी के अनुभव उसके काम आये और उसने ले देकर किसी तरह अपना फार्म वापिस करा लिया। मामला सुलट जाने के बाद वह राजधानी में नकली डिग्री बनाने वाले के पास गया और उससे बोला कि तुमने इतने सारे पैसे लेकर कैसी डिग्री दी कि मैं एम.ए. में भी नहीं बैठ सका व बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचायी है।
आत्मविश्वास से भरा हुआ नकली डिग्री बनाने वाला बोला- तुम तो बेबकूफ हो! तुम्हें एम.ए. का फार्म भरने की क्या जरूरत थी! जैसे मुझ से बी.ए. की डिग्री लेकर गये थे वैसे ही एम.ए. की भी ले जाते तो तुम्हारा काम चल जाता।

मोदीजी सीखने के मामले में तो शुरू से ही लगनशील रहे हैं। उन पर उनके किसी भक्त ने एक चित्र कथा ‘बाल नरेन्द्र’ के नाम से लिखी है जिसमें बताया गया है कि वे गेंद खेलने के शौकीन थे व नदी किनारे गेंद खेलते समय मगर के बच्चे को पकड़ कर ले आये थे।
[इसी अभ्यास के कारण शायद बड़े होकर वे अमित शाह को पकड़ कर ले आये होंगे]
चाय बेचते बेचते उन्होंने हिन्दी सीख ली तो सन्यासी रहते हुए बी.ए. करना कौन सी बड़ी बात है। जब नकली लाल किले पर चढ चुनाव लड़ कर असली लाल किले तक पहुँचा जा सकता है तो बी.ए, एम.ए. की डिग्रियों की क्या बात करे हो! 

मंगलवार, 17 मार्च 2015

व्यंग्य ओबामा का स्तीफा



व्यंग्य
ओबामा का स्तीफा
दर्शक
       व्हाइट हाउस में वह काली रात थी जब अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ज़िद पर अड़े हुये थे और मिशेल ओबामा उन्हें मनाने की हर चन्द कोशिश कर रही थीं।
‘मैं तो दे ही रहा हूं’ उन्होंने फिर कहा
देखिए यह किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं है’ मिशेल बोलीं
‘क्यों ठीक नहीं है, तुम्हें हिन्दी फिल्में देखने का शौक नहीं इससे तुम्हें पता नहीं है कि उनमें एक दोस्त दूसरे दोस्त के लिए क्या क्या नहीं कर देता, संगम, याराना, शोले, और न जाने कितनी फिल्में दोस्ती पर बनी हैं और तो और खुद दोस्ती नाम से भी फिल्म बनी है। मेरी दोस्ती मेरा प्यार, यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी, बगैरह ढेर सारे गाने मौजूद हैं, कहो तो सुनाऊँ जैसा कि मैंने हिन्दुस्तान से विदाई लेते समय सुनाया था’ ओबमा बोले।
मिशेल ने हिन्दुस्तानी बीबियों और माँओं की तरह डाँटते हुए कहा-‘ तुम मोदी की दोस्ती में बहुत बिगड़ते जा रहे हो, हिन्दी फिल्में देखने लगे हो’ हिन्दुस्तान में हर बीबी और माँ को लगता है कि उसका पति और बेटा तो ठीक है पर उसकी सारी बुराइयों की जड़ उसके दोस्त हैं।
‘देखो मिशेल तुम्हें और मोदी दोनों को हिन्दुस्तान की संस्कृति के बारे में कुछ भी पता नहीं है, वहाँ दोस्त जैसा कुछ भी नहीं होता था। वहाँ भाई होता था, बाप होता था , दादा होते थे, चाचा होता था, ताऊ होते थे, यहाँ तक कि साला, जीजा, मामा, फूफा, बगैरह होते थे पर वे रिश्तेदार होते थे, जाति के लोग होते थे, दोस्त कोई नहीं होता था। दोस्ती तो हिन्दुस्तान में नया विचार है, और अगर किसी ने मुझे दोस्त कहा है तो उसके लिए मैं जान भले ही न दूं, पर स्तीफा तो दे सकता हूं ओबामा ने समझाया।
‘पर वो हिन्दुस्तानी सलाहकार तो बता रही थी कि हिन्दुस्तान में पुराने जमाने में श्री किर्शना का एक फ्रेंड होता था सुडामा’ मिशेल बोलीं
‘ओह नो मिशेल, वो उसका फ्रेंड नहीं होता था, वो सहपाठी था, क्लासफैलो जिसे गुरुभाई भी कहते हैं, फ्रेंड होते तो वहाँ फ्रेन्डशिप डे मनाया जाता जबकि वहाँ सिस्टर डे होता है जब बहिन भाई को धागा बाँधता है, करवा चौथ होता है जब वाइफ हस्बेंड के लिए फास्ट करता है, डैड फादर मदर के लिए भी डे होता है, गुरू यानि टीचर का भी डे होता है, पर फ्रेंड के लिए कोई डे नहीं होता था। फ्रेंडशिप तो अंग्रेजों के जाने के बाद शुरू हुआ है और मोदी उसकी इज्जत कर रहा है, हाय कितना प्यारा लगता है जब वह कहता है- बराक माई फ्रेंड। हमें भी उसका वैसा ही जबाब देना चाहिए’     
‘चलो माने लेते हैं, पर उसकी पार्टी का एक राज्य के एक चुनाव में सूफड़ा साफ हो जाने से तुम क्यों स्तीफा दे रहे हो, उसकी पार्टी के चुनाव प्रचारक दें, राज्य के अध्यक्ष दें, जिलाओं के अध्यक्ष दें, राष्ट्रीय अध्यक्ष दें, प्रवक्ता दें मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी दें और अधिक से अधिक खुद मोदी दे दें जिन्होंने धुंआधार प्रचार किया था, पर आप क्यों दे रहे हैं
‘तुम नहीं समझोगी दोस्ती का मतलब, उसने मुझे भीगती बरसात और हाड़ कंपाने वाली सर्दी में गणतंत्र दिवस समारोह में इसी कारण से तो मुख्य अतिथि बनवाया था। मेरी बराबरी करने के लिए इतनी बार ड्रैसें बदलीं जितनी तो मलाइका अरोरा ने ‘डाली की डोली’ के एक गाने में नहीं बदलीं, और वह नौलखा सूट जिसमें सोने की धारियों से उसका नाम बुना गया था। क्या कहने! कितना हैंडसम लग रहा था मेरा मोदी फ्रेंड। उसने जो काम वर्षों पहले छोड़ दिया था उसे फिर से किया और मेरे लिए चाय बनायी, तथा बार बार मुझे मेरे पहले नाम से बराक बराक कह कर बुलाया-। जब ऐसा फ्रेंड संकट में है तो उसे अकेला कैसे छोड़ दूं अब वहाँ ऐसी पार्टी सत्ता में आ गयी है जो लोकयुक्त बना कर उसे धन देने वालों को नहीं छोड़ेगी, इसी दौरान स्विस बैंकों के नाम उजागर हो गये जिन्हें पिछले आठ –नौ महीनों से सरकार दबा कर रखे हुये थी ’
ओबामा अवसाद में हैं, वे सोच रहे हैं कि उनके कारण ही उनके मित्र को नीचा देखना पड़ा इसलिए स्तीफा दे ही देना चाहिए दूसरी ओर मिशेल परेशान हैं कि अगर स्तीफा दे दिया तो मेरा क्या होगा, इधर भाजपाई सोच रहे हैं कि अच्छा बदला लिया। खाँसने वाले ने नाक में दम कर दिया है और ये मीडिया वाले चैन नहीं लेने दे रहे हैं। और लाओ किरन बेदी को जो बलिवेदी साबित हुयी हैं।

व्यंग्य मैं मैं और सिर्फ मैं अर्थात बकरी



व्यंग्य
मैं मैं और सिर्फ मैं अर्थात बकरी
दर्शक
आत्ममुग्धता की कोई सीमा होती है। पर नरेन्द्र मोदी के लिए कोई सीमा नहीं। भोपाल के एक प्रसिद्ध शायर का शे’र है-
खुदा मुझको ऐसी खुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
पर मोदी जी ने यह शे’र नहीं सुना। सुना भी होगा तो अमित शाह से कहा होगा कि या तो शायर का इंतजाम करा दो या खुदा का। ये कैसे शे’र लिखता है! अरे आदमी जब नरेन्द्र मोदी हो जाता है तो उसे अपने सिवा कुछ भी दिखाई देना बन्द हो जाता है। वह जो कपड़े पहिनता है उस पर भी अपना ही नाम लिखा होता है। पता चला है कि ऐसे व्यक्ति घर की सारी रामनामियां भी बर्तन बेचने वालियों को देकर बर्तन खरीद लेते हैं और उन पर भी अपना नाम खुदवा लेते हैं। आखिर वे ऐसे कपड़े क्यों ओढें जिन पर किसी और का नाम लिखा हो। सुना है हुस्नी मुबारक भी ऐसे ही कपड़े पहिनते थे जिनकी धारियों पर उन्हीं का नाम लिखा होता था। सारे तानाशाहों के शौक एक जैसे होते हैं, और अंत भी। ऐसा आदमी किसी की शोकसभा तक में जाना पसन्द नहीं करता क्योंकि वहाँ सब केवल मृतक के बारे में बातें कर रहे होते हैं।
किसी भी तानाशाह को चित्र प्रदर्शनी में जाना पसन्द नहीं आता वह सिर्फ आइना देखना पसन्द करता है और जैसी कि एक घटना है कि जब शकील बदाँयुनी ने लिखा कि-
दीवाना बना देगी तुझको तिरी तनहाई
न मिल किसी से लेकिन आइना तो देखा कर
तो हसरत जयपुरी ने लिखा था कि-
आइना भी उन पै शैदा हो गया
एक दुश्मन और पैदा हो गया
आत्ममुग्ध लोग कई बार तो अपने अक्स को भी अपने बराबर मानने को तैयार नहीं होते। सारे पोस्टरों से अटल, अडवाणी, सब गायब केवल एक चेहरा एक नाम। चारों ओर सिर्फ बौने बौने और बौने। लोगों ने अपने जूतों की एड़ियां निकलवा दीं। जिनके बाल खड़े होते थे उनने खोपड़ियां राजनाथ सिंह की तरह सफाचट करवा लीं।
जरा कुछ और अपना कद तराशो
बहुत नीची यहाँ ऊँचाइयां हैं
बुन्देली में एक कहावत है जिसका अर्थ यह निकलता है कि अगर ओछी प्रवृत्ति के किसी व्यक्ति के पास लोटे जैसी साधारण सी उपलब्धि भी हो जाती है तो वह उसके प्रदर्शन के लिए बार बार शौच जाने का प्रयास करता है ताकि लोगों को अपनी उस उपलाब्धि को दर्शा सके। जाहिर है कि यह कहावत उस समय की है जब घर घर शौचालय बनवाओ का अभियान नहीं चला था ये बात और है कि इस अभियान के चल जाने के बाद भी लोग जाते तो वहीं हैं जहाँ उनके बाप दादे जाते रहे थे। अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने अगर दो बार कपड़े बदले तो मोदी ने तीन बार बदले और एक से एक चटक रंग के पहिने। स्कूल के अध्यापक भले ही उनके पद को – परिधान मंत्री- में बदल  जाने को वर्तनी की गलती मानें, पर मोदी तो जादूगरों के वाटर आफ इंडिया की तर्ज पर हर आइटम के बाद कपड़े बदलने का कार्यक्रम कर डालते हैं। प्रोटोकाल जाये तेल लेने, गणतंत्र दिवस की परेड में जब राष्ट्रपति परेड से सलामी लेते हैं तो मोदी जी भी सलामी लेने लगते हैं। हवाई अड्डे पर अमेरिका के राष्ट्रपति को लेने पहुँच जाते हैं, उनके लिए चाय बनाते हैं, पता नहीं चला कि उन्हें हवाई अड्डे पर देखकर सीड़ियों से उतरते हुए ओबामा ने मिशेल से ऐसा क्या कहा था कि बालों से ढके उनके चेहरे से मुस्कराहट दूर तक फैल गयी थी।
गाँधीजी अब नहीं हैं किंतु उनकी बकरियां अब जगह जगह चर रही हैं।  
वीरेन्द्र जैन                                                                           
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629
      

सोमवार, 16 मार्च 2015

व्यंग्य मंत्रिमण्डल



व्यंग्य
मंत्रिमण्डल
दर्शक
       प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी को लगता होगा कि सबसे कठिन काम मंत्रिमण्डल का गठन होता है। खुश होने वालों की तुलना में उदास होने वालों की संख्या बढ जाती है। भारत विजय अभियान के पूरा होने के बाद लगता है कि भारत को जीतना अपने संसदीय दल को जीतने से ज्यादा सरल काम है।
       बेचारे अडवाणीजी को जब संघ द्वारा प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नहीं बनाया गया था तब भी उन्होंने सपना देखना नहीं छोड़ा था। वे सोच रहे थे कि मोदी के नाम पर बहुमत तो मिलेगा नहीं और एनडीए के घटक दल अपनी लाज बचाने के लिए उनके नाम पर ही सहमत होंगे, पर जब उनका यह सपना भी टूट गया तभी से लगातार उनके आँसू बह रह हैं, ये बात अलग है कि वे उन्हें खुशी के आँसू कह रहे हैं। मजबूरी यह है कि बेचारे पूर्व उप प्रधानमंत्री मोदी के नीचे उपप्रधान भी नहीं बन सकते। अनारकली को सलीम मरने नहीं देना चाहता और अकबर जीने नहीं देते।
       बेचारी सुषमाजी को जब से अडवाणीजी ने अपनी उम्र को बाधा बताये जाने पर वैकल्पिक उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की थी और बाल ठाकरे ने उनके नाम का अनुमोदन कर दिया था, तब से ही संस्कृत में शपथ लेने का अभ्यास करने लगी थीं। पर जनता है कि जब फिसलती है तो फिसलती ही चली जाती है सो छींका उनके भाग्य से भी नहीं टूटा। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही देश उनके चेहरे पर मुस्कान देखने को तरस गया। मजबूरी यह है कि वे वरिष्ठता के नाते मंत्रिमण्डल में सम्मलित होने से इंकार भी नहीं कर सकतीं। प्रधानमंत्री पद की प्रतियोगी को उप प्रधानमंत्री पद तो छोड़िये वित्त और गृह विभाग तक भी नहीं मिला, और मिला तो सबसे कठिन विदेश विभाग मिला। सो यहाँ भी मामला अडवाणी जी जैसा ही है। अडवाणीजी जिन आँसुओं को खुशी के बता देते हैं तो सुषमाजी को उन्हें पी जाना पड़ता है। उस पर तुर्रा यह है कि सोनिया गाँधी के खिलाफ सिर मुढाने की धमकी से लेकर हर मामले तक उनसे लगातार प्रतियोगिता करने वाली उमाभारती को केबिनेट मंत्री के रूप में उनके बराबरी पर बैठा दिया गया है।
       अपने को अडवाणीजी का हनुमान बताने वाले वैंक्य्या नायडू भी उसी मंत्रिमण्डल में सम्मलित हैं जिसमें उमाभारती बैठी हैं जिन्हें देखते ही उन्हें याद आ जाता है कि उनका अध्यक्ष पद क्यों गया था और बाद में उन्हें उपाध्यक्ष पद पर प्रतिष्ठित होना पड़ा था। विडम्बना यह थी कि सत्यभाषी वैंक्य्या जी ने अपनी पत्नी की बीमारी को अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने का कारण बताया तब साध्वी ने उनकी पत्नी की बीमारी का जो हैल्थ बुलेटिन जारी किया था उसे वैंक्य्या जी जीवन भर नहीं भूल सकते। वह तो गनीमत रही कि उन्हें स्वास्थ मंत्रालय नहीं दिया गया।
       वैसे तो उमाजी ने खुद को फायर ब्रांड सिद्ध करने के लिए कभी नरेन्द्र मोदी के बारे में भी कहा था कि वे विकास पुरुष नहीं अपितु विनाश पुरुष हैं और इसका वीडियो चुनावों के दौरान खूब दिखाया गया। बाद में उन्होंने कहा कि यह बयान उन्होंने अहमदाबाद में दिया था और अहमदाबाद से बड़ौदा तक आते आते जो विकास उन्होंने देखा तो वे चमत्कृत हो गयीं थीं और उन्होंने पूरे गुजरात से भाजश के अपने प्रत्याशी वापिस लेने की घोषणा कर दी थी। बहरहाल उनके ज्ञानार्जन से लोग जरूर चमत्कृत हो गये होंगे, विशेष रूप से अहमदाबाद वाले जिन्हें अपना विकास बड़ौदा से पीछे नजर आया था। शायद यही कारण रहा होगा कि गर्वीले गुजरात के छप्पन इंची सीने वाले शेर को अहमदाबाद से चुनाव लड़वाने के लिए कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं मिला और अमेरिका में शूटिंग कर रहे हास्य अभिनेता परेश रावल को बुला कर उम्मीदवार बनाना पड़ा। वैसे उमाजी के मंत्रिमण्डल में सम्मलित होने से सुषमाजी या वैंक्य्याजी कुछ भी सोचते हों पर अडवाणी जी के दूसरे भक्त मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जरूर संतुष्ट हैं कि उनकी कुर्सी पर बुरी नजर वाला एक खतरा तो कम हुआ।
       मुण्डेजी का एक दुर्घटना में दुखद निधन हो गया बरना भाजपा के पूर्व अध्यक्ष गडकरीजी और मुण्डेजी का एक साथ एक ही मंत्रिमण्डल में होना भी आश्चर्य से देखा जाता। शायद यही कारण रहा होगा कि लोग मुण्डेजी को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में देखने लगे थे। गडकरीजी को संघ की इच्छा के विपरीत जिन मोदीजी ने दुबारा अध्यक्ष नहीं बनने दिया था उन्हीं के मंत्रिमण्डल में सम्मलित हो जाने से याददाश्त तो खत्म नहीं हो जाती।
       सुना तो था कि पूर्व विनिवेश मंत्री अरुण शौरी को भी मंत्रिमण्डल में सम्मलित किया जा रहा है पर जिस मंत्रिमण्डल में राजनाथ दूसरे नम्बर पर विराज गये हों तो उन्हें सार्वजनिक रूप से हम्पी डम्पी औए एलिस इन वन्डरलेंड कहने वाले को देखना भी कौतुकपूर्ण होता।
       बहरहाल मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी की पद से सम्बन्धित प्रतिभा और उस प्रतिभा को पहचानने की योग्यता के बारे में इतना कहा जा चुका है कि मैं अब क्या कहूं। आपात काल में दुष्यंत कुमार ने कहा ही था कि-
मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं
बोलना भी है मना, सच बोलना तो दर किनार