मंगलवार, 2 जनवरी 2018

व्यंग्य लाल बुझक्कड़ों के हाथों में जिन्दगी

व्यंग्य
लाल बुझक्कड़ों के हाथों में जिन्दगी
दर्शक
मोदी जनता पार्टी की सरकार आने के बाद कम से कम एक चमत्कार तो हुआ ही है, जिसके प्रभाव में स्वास्थ विभाग के सारे डाक्टर और कर्मचारी बेकार हो जाने वाले हैं। वह तो गनीमत समझो कि इस रहस्य का पता चलते ही हमारे आर्कमडीज दिगम्बर अवस्था में बाथरूम से यूरेका यूरेका चिल्लाते हुए नहीं भागे, शायद इस का कारण यह रहा हो कि वे बाथरूम में तब ही होते हों जब उनके किसी ऐसे समर्थक का फोन आया हो जिससे वे न “हाँ” कर पा रहे हों और ना “ना”। वे नहाते जरूर हैं किंतु उस दिन नहाते हैं जब सूर्य या चन्द्र ग्रहण पड़ता है और उसके प्रभाव से मुक्त होने के लिए लाखों वोटर नहा रहे होते हैं। वोटरों को पता लगना चाहिए कि उनका नेता पर्व के दिन पवित्र नदी में स्नान भी करता है। चूंकि नदी मैली हो चुकी है इसलिए वे उस दिन वहाँ से लौट कर घर में नहाते हैं।
बहरहाल मुद्दे की बात यह है कि असम राज्य के एक मंत्री, जो दुर्भाग्य से राज्य के स्वास्थमंत्री भी हैं, के ज्ञानचक्षु खुल गये और उनको दिव्यज्ञान हुआ कि कैंसर आदि रोगों की जड़ कहाँ हैं। यह ज्ञान उन्हें गीता पढ कर हुआ बताया गया है। वैसे गीता तो सैकड़ों सालों से हजारों लोग पढ रहे हैं या उस पर हाथ रख कर अदालतों में झूठी कसमें खा रहे हैं, पर किसी को यह दिव्यज्ञान नहीं हुआ इसे ही भाग्य की बात कहते हैं। मंत्रीजी ने बताया कि कैंसर आदि तो पिछले जन्मों के पाप का फल है। जब पिछले जन्मों के पाप का फल है तो उसका कोई उपचार नहीं, क्योंकि आप पिछले जन्म में वापिस जाकर भूल चूक को सुधार कर लेनी देनी भी नहीं कर सकते। गीता में यह भी कहा गया है कि कर्म किये जाओ फल की चिंता मत करो। कच्चा, सड़ा, कीड़ा लगा, कैसा भी फल मिले उसकी चिंता किये बिना आप को खाना ही पड़ेगा।
ऐसे ज्ञान की बात सुन कर राम भरोसे ने फिर से तम्बाखू खाना शुरू कर दिया, सिगरेट धौंकने लगा और हुक्का लौंज में जाने लगा क्योंकि इस जन्म में तो ऐसा कुछ होने से रहा, अगर पिछले जन्म में कुछ उल्टा सीधा किया होगा तब ही इस जन्म में कैंसर जैसी बीमारी होगी, जिसे कोई माई का लाल रोक ही नहीं सकता। उसे छुन्नन गुरू की वह बात याद आ गयी जब वे भाँग घौंटने और छानने के बाद कहा करते थे-
छान छान
किसी की मत मान
जब निकल जायेगी जान
तब कौन कहेगा छान
असम के मंत्री का इसमें कोई दोष नहीं है, वह तो अपनी परम्परा का अनुसरण कर रहा है। जब से वह मोदी की शरण में आया है तब से उसने मोदी में वह स्वरूप देखना शुरू कर दिया है जो कहता है कि ‘ सर्व धर्म परित्याज, मामेकं शरणं ब्रज’। उसने जब देखा कि उसके गुरू असपताल का उद्घाटन करते हुए हिन्दुस्तान की महान शल्य चिकित्सा का उदाहरण गणेशजी के सिर के ट्रांसप्लेंटेशन में पाते हैं तो पिछले जन्म के पापों की सजा इस जन्म में बता देने से सरकार सारी जिम्मेवारियों से मुक्त हो जाती है। सरकार प्राकृतिक न्याय में दखल नहीं दे सकती। जो पाप किये हैं उनकी सजा सबको भुगतना है। डाक्टरों का काम तो केवल झूठ मेडिकल बिलों की पुष्टि करना, फौजदारी में सरकार की सुविधा से प्रमाणपत्र देना व जेल गये नेताओं को बीमारी का प्रमाणपत्र देकर उन्हें विशिष्ट सुविधाएं दिलवाना होता है। बाकी सब तो ऊपर वाले को करना है। वही मेडिकल रिप्रेजंटेटिव्स को भेजता है। मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं सिवाय जिओ की सिम डले मोबाइल के।
अभी तक कैंसर के इलाज का दावा करने वाले लाला रामदेव की प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी है जो हनुमान चालीसा की तर्ज पर कहते पाये जाते हैं कि-

और देवता चित्त न धरई/ हनुमतवीर सदा सुख करई।     

व्यंग्य नोटबन्दी और देह व्यापार में कमी

व्यंग्य
नोटबन्दी और देह व्यापार में कमी
दर्शक
सच बोलने का एक फायदा यह भी होता है कि यह याद नहीं रखना पड़ता कि किससे क्या कहा था।
किंतु बेशर्मी इससे भी ऊपर की चीज है वह कहती है कि कहा था सो कहा था। कसमें वादे प्यार बफा सब बातें हैं बातों का क्या। इसमें थोड़ा सा परिवर्तन करके आप जुमले कर सकते हैं, जुमले हैं, जुमलों का क्या। भाजपाइयों की निगाह में अभिव्यक्ति की आज़ादी का यही मतलब है कि चाहे जब चाहे जो कहते रहो। इनके यहाँ जुबान की जबाबदेही नहीं होती। भाजपाई हैं कोई हरिश्चन्द्र थोड़े हैं।
गलती हो जाये तो मान लेना चाहिए, अंग्रेजी में तो कहा गया है मनुष्य ही गलती करता है। अपनी पुराण परम्परा में तो देवता तक गलती करते रहे हैं और कोई सुन्दर मनुष्य का चेहरा मांगने जाये तो बन्दर का मुँह दे देते रहे हैं। काका हाथरसी ने तो कहा है –
गलती तो सबसे होती है
ईश्वर ने क्या भूल नहीं की
हाथी की जो असल पूँछ थी
वो उसके मुँह पर लटका दी
अपनी भूल छुपाने को फिर
एक गधे की पूंछ खींच कर
हाथी के पीछे चिपका दी
मुखमण्डल पर दोनों आँखें
पास पास ही फिट कर दी हैं
एक आँख आगे दे दी, तो
एक आँख पीछे दे देते
तो क्या कुछ घाटा हो जाता!
सिर पर कोई चपत मार कर भाग जाये तो क्या कर लोगे!
चुटकले भी कई बार सटीक चरित्र चित्रण कर देते हैं। और कई बार तो क्या अगर आपको चरित्रों का ज्ञान हो तो अक्सर यह काम करते हैं। एक मास्टर साब ने जो पहली बार पधारे थे, ने छटवीं कक्षा में एक सवाल पूछा- एक हवाई जहाज दिल्ली से मुम्बई की ओर तीन सौ किलोमीटर की रफ्तार से जा रहा है तो बताओ मेरी उम्र क्या है?
पूरी कक्षा सन्न। सुइ पटक सन्नाटा। किसी भी छात्र के पास उत्तर नहीं था। अंत में पीछे की बेंचों पर बैठने वाला एक छात्र उठ खड़ा हुआ और पूछा- मास्साब मैं बताऊं?
हाँ हाँ तुम भी तो इसी कक्षा के छात्र हो बताओ, बताओ, मास्साब ने कहा।
सर आपकी उम्र चालीस साल है।
मास्साब गद्गद। सचमुच उत्तर सही था। मास्साब की उम्र चालीस साल थी। वे पीछे छात्र की ओर बढे। छात्र सहम गया कि अब पिटाई होगी। उसने दोनों हथेलियों से कनपटियों को सुरक्षित करते हुए सिर को एक ओर झुका लिया। मास्साब उसके निकट आये और उसे गले से लगा लिया। पूरी कक्षा एक बार फिर सन्न। उस लड़के के साथ भी यह गौरव के क्षण ऎतिहासिक थे। वे उसके कन्धे पर हाथ रख कर कक्षा में आगे ले आये और अपनी सीट के पास खड़ा करके बोले – शाबाश, अब तुम पूरी कक्षा को समझाओ कि तुमने कैसे हिसाब लगाया और इस सही उत्तर तक पहुँचे। छात्र ने एक बार मास्साब को फिर परखा और आश्वस्त होकर बोला- सर मेरे एक बड़े भाई हैं वे आधे पागल हैं, और उनकी उम्र बीस साल है।
मैं भी अगर जान की अमान पाऊँ तो कहूं कि नोटबन्दी की हैप्पी बर्थडे पर महामना रवि शंकर प्रसाद ने उसके प्रभावों में से एक जो देह व्यापार में कमी महसूस की है वह ऐसी ही है। वे विकास के बड़े पापा की तरह लग रहे हैं। किंतु पार्टी में वे अकेले नहीं हैं उनके मामा भारत माता के मध्य प्रदेश अर्थात गोद में खेलते हुए महसूस कर रहे हैं कि प्रदेश की सड़कें वाशिंग्टन की सड़कों से अच्छी हैं। कुछ लोग गाय के गोबर ही नहीं नथुने से भी आक्सीजन छुड़वा रहे हैं। कुछ लोग राम मन्दिर बना कर राम राज्य लाने की घोषणा कर रहे हैं। ये बात अलग है कि राम बनवास की धरती पर उनके प्रचार का असर केवल इतना हुआ कि उनकी पार्टी हर तरह की झीक [यह एक बुन्देली शब्द है] लगाने के बाद भी पराजित हो गई। पता नहीं मुख्यमंत्री का उखाड़ा गया टायलेट अब कहाँ गाड़ा जायेगा।


व्यंग्य सड़कीले नेता

व्यंग्य
सड़कीले नेता
दर्शक
रामभरोसे प्रार्थना कर रहा था- हे प्रभु मुझे लक्ष्मीजी का उल्लू बना देना, गणेशजी का चूहा बना देना, और चाहे तो गुजरात का गधा बना देना जिसका विज्ञापन सदी का महानायक कहलाने वाला वयोवृद्ध अभिनेता करता है, पर मुझे किसी पार्टी का प्रवक्ता मत बनाना, खास तौर पर फेंकू उस्तादों की राष्ट्रवादी पार्टी का। पहले तो सोचता था कि प्रवक्ता बनना सबसे अच्छा है जिसके सहारे बिना कुछ किये धरे ही प्रतिदिन टीवी पर अपना चौखटा दिखाने का मौका मिलता है, पर जबसे देखा है कि प्रवक्ता को नेता के प्रत्येक बयान का बचाव करते हुए उसे दुनिया का सबसे सही वकव्य सिद्ध करना पड़ता है तब से आत्मा कांप गयी है।
यह प्रार्थना मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के वाशिंग्टन में दिये उस बयान से सम्बन्धित टीवी शो देखने के बाद हो रही थी जिसमें प्रवक्ता ने शिवराज सिंह द्वारा मध्य प्रदेश की सड़कों को अमेरिका की सड़कों से बेहतर बताया था व प्रवक्ता जी सारे पैनलिस्टों और लाखों दर्शकों की उपहासपूर्ण हँसी के बीच बयान का बचाव कर रहे थे। उसी के बाद ही प्रदेश, देश और स्थानीय मीडिया में प्रदेश की टूटी फूटी सड़कों के हजारों फोटोग्राफों के साथ तरह तरह के कार्टून व टिप्पणियां प्रकाश में आने लगीं। रोचक यह है कि जब सारे लोग मजे ले रहे थे तब भी प्रवक्ता अपनी बात ठेल रहे थे जबकि उनके हाव भाव से लग रहा था कि वे खुद भी अपनी बात से मुतमईन नहीं हैं।
भाजपा को जहाँ एक ओर कुर्सी के लिए सारे समझौते करना पसन्द है वहीं अपने किसी नेता का कुर्सी छोड़ना बिल्कुल नहीं भाता। उनकी पार्टी में जिसने भी स्तीफा दिया उसका फजीता हुआ। मदनलाल खुराना हों, उमा भारती हों, बाबूलाल गौर हों, येदुरप्पा हों, कल्याण सिंह हों, केशू भाई पटेल हों, जसवंत सिंह हों, यशवंत सिन्हा हों सभी पछताये। उमर और स्वास्थ के कारणों से भी हटाये गये लोग भी दुखी दिखे। बाबा राम रहीम के साथ बराबर के साझेदार हरियाणा के खट्टरों समेत किसी ने स्तीफा नहीं दिया। राष्ट्रीय पार्टी को बचा खुचा टुकड़ा डालने वाली शिरोमणि अकाली दल के साथ जो मिला उसे भी अपमान की चटनी के साथ चाटते रहे। शिव सेना चाहे जब लतियाती रही पर कुर्सी के लालच में इन्होंने उसे पुचकारना बन्द नहीं किया। मध्य प्रदेश में इतने काण्ड हुये और हर बार लगा कि अब तो सरकार को अपना बोरिया बिस्तर समेट लेना चाहिए किंतु मुख्यमंत्री के चक्कर में काँग्रेसी राज्यपाल को भी तब तक वापिस नहीं बुलाया जब तक कि स्वयं यमराज ने नोटिस नहीं भेज दिया। हाल यह है कि अभी तक भी उस राजभवन में कोई स्थायी राज्यपाल आने की स्थिति नहीं बन सकी है।
मध्य प्रदेश के अनेक केबिनेट मंत्रियों की तरह छत्तीसगढ के मंत्री की सीडी भी सरे बाज़ार नीलाम हुयी और प्रवक्ताजी के सामने फिर संकट खड़ा हो गया। किसी को भी नक्सलवादी कह कर बन्द कर देने वाली छत्तीसगढ की पुलिस नोएडा के पत्रकार के पीछे पड़ गयी जिसने स्टिंग किया था। एक ओर प्रवक्ता जी कह रहे हैं कि सीडी में मंत्री जी नहीं हैं और दूसरी ओर कह रहे हैं कि देश के एक वरिष्ठ पत्रकार को आधी रात गिरफ्तार करके सही किया। भैया जब सीडी ही असली नहीं है तो सामने आने देते। कहा जाता है कि हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री के दुश्मन संजय जोशी की सीडी तो गुजरात से ही जारी हुयी थी जिसकी लीपापोती मध्य प्रदेश में ही हुयी थी।
नैतिकता और भावना को ठेस इत्यादि लगने की बातें तो हाथी के दांत हैं। कुर्सी मिली हो तो सब हजम कर लेती है राष्ट्रवादी पार्टी और उनका मातृ पितृ संगठन । संगठन ने बंगारू लक्षमण से लेकर जूदेव और येदुरप्पा से लेकर व्यापम तक किसी की आलोचना नहीं की।

भाजपा प्रवक्ता होने के लिए कितना बेशर्म होना पड़ता है।                                                                                                                                                                                                                                   

व्यंग्य विकासखाना में एडवांस दिवाली


व्यंग्य
विकासखाना में एडवांस दिवाली
दर्शक
क्या फेसबुक, क्या व्हाट’स एप्प सब के सब हैप्पी दीवाली की फुलझड़ियों, खील बताशों और लक्ष्मीजी के सूंड़ उठाये हाथियों से भर गया था। यह देख कर रामभरोसे खीझ गया। उसने गुस्से में लिखा कि अभी दीवाली को एक साल से ज्यादा पड़ा है और आप लोग हैप्पी दीवाली, हैप्पी दीवाली चिचियाए जा रहे हैं। बन्द करो।
उसके ऐसा लिखने के बाद एक साथ पचासों उत्तर आये- दीवाली तो आज ही है।
रामभरोसे ने गुस्से से उत्तर दिया – विकास हो गये हो क्या! आप लोगों को देश के प्रधानसेवक पर बिल्कुल भरोसा नहीं है जिन्होंने खाकड़ा आदि पर जीएसटी कम करते हुए घोषणा की थी कि देश में पन्द्रह दिन पहले ही दिवाली आ गयी है। पूरा देश खुशी से झूमने लगा है। अब जब दिवाली बीत ही चुकी है तो अब काहे की हैप्पी दिवाली, हैप्पी दिवाली। जो हो ली, सो हो ली। अगली दीवाली तो गुजरात के चुनाव हो जाने के बाद ही आयेगी।
राम भरोसे का दिमाग बहुत तेज चलता है, कई बार तो वह उससे भी आगे निकल जाता है जिसका पीछा करते हुए वह तेज चल रहा होता है। पिछले दिनों विश्व पर्यटन स्थल से बाहर कर दिये गये ताजमहल को देखने आगरा गया था, और वहाँ के प्रसिद्ध पागलखाने को देख कर सलाह दे आया कि इसका नाम विकासखाना रख देना चाहिए, क्योंकि विकास पागल हो गया है।
इसी विकासपंती में मध्य प्रदेश के एक आईपीएस के ज्ञान चक्षु अचानक ऐसे खुल गये, जैसे कलियां चिटक कर फूल बनती हैं। वे शायद किसी विक्रमादित्य की न्यायशिला पर विराजमान हो गये हों जैसे। बोले कि पीएससी की परीक्षा में जो मेरी रैंक से बहुत पीछे था वह आरक्षित वर्ग का होने के कारण आईएएस बन गया और मैं आईपीएस रह गया। उन्हें कर्ण और शम्बूक की कथाएं याद नहीं आयीं जिनके साथ जाति के कारण ही अन्याय हुआ था। सामाजिक न्याय को यही तो शिकायत है कि न्याय की मांग वह बहुत चयनित होती है। पौराणिक इतिहास को तो छोड़िए उन्हें अभी हाल ही में लिब्राहन आयोग की जाँच की तरह खिंच रही व्यापम की याद भी नहीं आयी जिनमें योग्यता के ऊपर पैसा, सम्पर्क और पद ने हजारों प्रतिभाओं की ऐसी की तैसी कर दी थी और न्याय भी नहीं मिला। न्याय न मिलने देने के लिए दर्जनों की जान जरूर चली गयी। पता नहीं तब आईपीएस साहब ने मुँह क्यों नहीं खोला था।
पिछले दिनों दलितों, पिछड़ों की चेतना में जो उभार आया है वह फोड़ा फुंसी नहीं है कि बुजर्गों के आशीर्वाद से फल फूल गये हों। उन्हें समान मानव होने और संविधान में निहित समान अधिकारों का भान हो गया है। उन्हें यह भी समझ में आ गया है कि अधिकार भीख में नहीं मिलते अपितु लड़ कर छीने जाते हैं। इसी भान ने सत्ता की मलाई सड़ोकने वालों को बेचैन कर रखा है कि अब कम्बल साड़ी और दारू की बोतल पर वोट नहीं मिलने वाला सो कम होते रोजगारों के अवसर से जनित गुस्से को आरक्षण की ओर मोड़ दो। कच्ची, जली, सूखी, चुपड़ी का सवाल तो बाद में आयेगा पहले रोटियां तो हों।
एक विकास हरियाणा की जेल में जमानत के लिए छटपटाते हुए पड़ा है तो दूसरा विकास गुजरात में सोलह हजार गुना एक साल में हो जा रहा है क्योंकि वह न खाऊंगा न खाने दूंगा की घोषणा वाली पार्टी के अध्यक्ष का बेटा है। उसे अम्बानी की कम्पनी बिना किसी जमानत के करोड़ों का ऋण दे देती है और उसे अपनी खाता बही में भी नहीं दिखाती।
दिन भर रोजी रोटी की मारामारी में जूझ रहे  मोदी मोदी जपते आम भक्त आदमी को तो पता ही नहीं चलता कि नेपथ्य के पीछे क्या खेल चल रहा है। राहत इन्दौरी ने कहा है-
बन के इक हादसा बाज़ार में आ जायेगा /  जो नहीं होगा वो अखबार में आ जायेगा

चोर उचक्कों की करो कद्र कि मालूम नहीं /  कौन कब कौनसी सरकार में आ जायेगा  

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

व्यंग्य वीसी की सीवी

व्यंग्य
वीसी की सीवी
दर्शक
ये वीसी क्या होता है?
‘वाइस चांसलर’
‘वाइस क्या होता है?’
रामभरोसे को पता नहीं था इसलिए उसने तुरंत ही स्मार्ट फोन में शब्द खोला और अंग्रेजी से हिन्दी का विकल्प चुना। वी आई सी ई टाइप किया और सर्च दबाया। वहाँ लिखा था वाइस/ वाइसी , नाउन।...  और शब्दार्थ दिया था , नुकसान, पाप, पापाचरण, बाँक, बुराई, व्यसन, शरारत, शिकंजा, हानि, खराबी । उसे लगा कि कुछ गड़बड़ हो गई है इसलिए उसने चांसलर/चैंसलर भी सर्च किया। वहाँ बिल्कुल ठीक लिखा था – कुलाधिपति, राज पंडित आदि ।
अगर शब्दकोश के अनुसार कोई बीएचयू के वीसी का अर्थ निकाले तो क्या अर्थ होगा? अब जाकर उसे गूगल के अनुवाद का रहस्य पता चला।  
अगर फूल कागज या प्लास्टिक के न हों तो शाखा से ही निकलते हैं। वीसी भी अगर शाखा से निकले हों तो......... । बहरहाल बीएचयू के त्रिपाठीजी शाखा से ही निकले थे और इसीलिए वीसी बनाये गये थे। आजकल पदों पर प्रतिष्ठित करने में इकलौती प्रतिभा यही रह गयी है। शाखा से निकलो और शिखर् पर सवार हो जाओ। पद चाहे फिल्म इंस्टीट्यूट का हो या नैशनल बुक ट्रस्ट का, सब के सिर पर शाखा के फूल चढे हुये हैं।
आजकल फूल चढी समस्त संस्थाओं का एक ही फार्मूला हो गया है, या तो जो कुछ हम कह रहे हैं, उससे सहमत हो जाओ बरना देशद्रोही। वे अगर कहें कि सूरज पश्चिम से निकलता है तो स्वीकार करना पड़ेगा नहीं तो देश द्रोही की गाली सुनो। उनके अन्धे देशभक्त देशद्रोहियों को कैसे सहन करेंगे इसलिए एक के भोंकने की आवाज सुन कर भोंकेने लगते हैं। पूरे कैम्पस से भों भों सुनाई देने लगती है। भक्त किसी को कहीं भी मारने से पहले कह देते हैं कि वह गौमाँस खा रहा था। गौभक्त भी बाँहें चढा लेते हैं, कोई बहादुर नहीं पूछता कि माँस कहाँ हैं, या है तो कैसे जाना कि यह गौमाँस ही है। कोई ट्रेन में सीट नहीं दे तो कह दो कि गौमाँस क्यों खा रहे थे और मार पीट कर फेंक दो। दफ्तर में अफसर डांटे तो कह दो कि वह लंच में गौमाँस लाता है। गाली देकर कह दो कि बन्दे मातरम बोलना पड़ेगा। राष्ट्रभक्ति चण्डाल चौकड़ी की चेरी बन गई है। मीडिया से कह दो कि बस हनी प्रीत द्वारा बाबा से प्रीत करने के वीडियो को तरह तरह के कोणों से दिखाते रहो। सत्यकथाएं बेचने वाले मक्खियां मार रहे हैं क्योंकि रेलवे स्टेशन पर ग्राहक कहता है कि हनी प्रीत की कहानी वाली कोई पत्रिका हो तो वही दो।
भ्रष्टों पर कार्यवाही का दबाव बनाओ और उन्हें पार्टी में शामिल कर लो कार्यवाही किसी पर मत करो। जो शामिल नहीं हुए उन्हें डराते रहो। टूजी, थ्रीजी, जीजाजी, किसी पर कार्यवाही मत करो। पड़ोसियों का डर दिखाओ और हथियार खरीदते रहो। नक्स्लवादियों का डर दिखा कर जंगल में खनन माफिया की सुरक्षा में सुरक्षा बल लगा दो। बाँध बनाने से उजड़े ग्रामवासियों का पुनर्वास मत करो। बाबाओं को आगे कर चुनाव जीतो और अगर वे बदनाम हो जायें तो बाबा बदल दो। बेटे से बाप पर टिप्पणी लिखवा दो। यही अनुमान करके अकबर इलाहावादी लिख गये हैं-
हम ऐसी सब किताबें, काबिले ज़ब्ते समझते हैं
कि जिनको पढ कर बेटे बाप को खब्ती समझते हैं
                                                                                                                   

    

बुधवार, 13 सितंबर 2017

व्यंग्य ‘डे’ का दिन और एमपी की झाँकी

व्यंग्य
‘डे’ का दिन और एमपी की झाँकी
दर्शक
कुछ सेवक ऐसे सेवक होते हैं, जो अपनी सेवा शर्तों के अनुसार तय शुदा काम और किये गये अनुबन्ध के काम तो नहीं करते पर इसके अलावा चौबीस घंटों में अठारह घंटे काम करने का दावा करते हैं, व भक्तों से इसके लिए जय जयकार कराते रहते हैं।
एक कहानी इस प्रकार है- एक बार जंगल में एक बन्दर को मंत्री चुन लिया गया। जब उसके पास एक शिकायत लेकर एक खरगोश आया तो उसने इस डाल से उस डाल पर और उस डाल से इस डाल पर लगातार छलांगे लगाना शुरू कर दिया। ऐसा करते करते जब काफी समय हो गया तो खरगोश को शक हुआ। उसने कहा कि हुजूर मेरे काम का क्या हुआ? बन्दर बोला काम हुआ या नहीं, पर मेरे प्रयास में कोई कमी हो तो बताओ! ऐसा कह कर वह बन्दर फिर से इस देश से उस देश........ क्षमा करें, इस डाल से उस डाल पर छलांगे लगाने लगा।
उसे अपने छप्पन इंची सीने के साथ अठारह घंटे काम जो करना था।
विवेकानन्द के दिये हुए ऎतिहासिक भाषण को 125 साल हो गये। यह भाषण इतने ही सालों से वैसे का वैसा ही है, न 124वें साल में बदला था न 160वें साल में बदलेगा भले ही उसके बहाने अपने मन की बात कहने वाले बदल जायें और भाषण की व्याख्याएं बदल जायें। छात्रों के हाकी मैच वाले लेख की तरह के एक लेख याद कर लो, जब भी किसी विषय पर लेख लिखने को कहा जाये तो कोई सन्दर्भ निकाल कर उसमें हाकी मैच पिरो दिया जाये क्योंकि हमें तो वही याद है। चाहे पिकनिक हो या ताजमहल की यात्रा हाकी मैच की जगह निकल ही आती है। विवेकानन्द के भाषण की जयंती पर भी प्रधानसेवक को सफाई की याद आ गयी और जेएनयू में हुये छात्रसंघ चुनाव में उनकी छात्र इकाई की पराजय के कारण कैम्पस की याद भी आ गई। यह याद नहीं आया कि पिछले सौ दिनों में सीवर की सफाई करते हुए देश में 39 लोग अकाल मौत मर गये। ये ऐसे सैनिक हैं जो बिना हथियारों, अर्थात सुरक्षा उपकरणों के सबसे बुरी मानी जाने वाली गन्दगी को अपने हाथों से साफ करते हैं। इन बहादुरों को शहीद का दर्जा भी नहीं दिया जा सकता।
हमारे प्रधानसेवक ने इसी अवसर पर कहा कि हम हर रोज कोई न कोई डे मनाते हैं, तो इसी तर्ज पर पंजाब डे, केरल डे, आदि क्यों नहीं मनाते। इस दिन हम उसी प्रदेश की तरह के कपड़े पहिनें, खाना खायें, सांस्कृतिक कार्यक्रम करें आदि।
उनकी इस बात को सुन कर राम भरोसे बहुत उत्साहित हो गया और भागा भागा मेरे पास आया। बोला हम एमपी डे मनायेंगे। उत्तर में मैंने अपनी औकात के अनुसार प्रतिक्रिया दी कि पहले एमएलए डे से शुरू करो। उसने माथा ठोक कर कहा कि एमपी यानि कि मध्य प्रदेश। मैंने कहा ठीक है प्रारूप बताओ। बोला कि दशहरा मैदान में एक मेला लगायेंगे जिसमें कई झांकिया होंगीं। पहली झाँकी व्यापम की होगी जिसमें पीएमटी से लेकर विभिन्न परीक्षाओं में इम्पोर्टेड बच्चे दूसरे के नाम से परीक्षा दे रहे होंगे। नेताओं के निजी सचिव और रिश्तेदार नोट गिन रहे होंगे, कुछ आत्महत्या कर रहे होंगे, कुछ को मार दिया जा रहा होगा। वगैरह। दूसरी झाँकी किसानों पर गोली चलाती बहादुर पुलिस की होगी तो तीसरी झाँकी जेल से भाग कर आत्मसमर्पण करने की कोशिश में मारे जा रहे कैदियों की होगी। तीसरी झाँकी अस्पताल में मोतियाबिन्द के आपरेशन के लिए आये मरीजों के अन्धे होकर जाने की होगी, तो चौथी झाँकी पेटलाबाद की होगी, पांचवीं झाँकी खाली पड़ी मानवाधिकार आयोग और लोकायुक्त की कुर्सियों की होगी। छठवीं झाँकी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की गौशाला की होगी, सातवी झाँकी ..................
अरे बस भी करो भाई कितनी झाँकियां निकालोगे! एमपी अजब है सबसे गज़ब है।  


रविवार, 27 अगस्त 2017

व्यंग्य बाबाओं की पार्टी

व्यंग्य
बाबाओं की पार्टी
दर्शक
बाबा शब्द में ही बहुत धोखा है। मुम्बई गोआ से आयातित बाबा माने बच्चा होता है इसलिए काँग्रेस के विरोधी राहुल के आगे या पीछे बाबा लगा कर खुश हो जाते हैं। पश्चिम से ऊपर उठने पर बाबा माने दादा हो जाता है, और यह दादा मुहल्ले कस्बे के गुंडों वाला दादा नहीं अपितु दादी के जोड़े वाला दादा होता है। जो लोग मार्ग दर्शक मण्डल वालों को उनके नाम से नहीं जानते उन्हें भी बाबा कह देते हैं। भंडारे में बैठे वृद्धाश्रम वाले मार्गदर्शक मण्डल वालों को कहा जाता है कि बाबा उठो अब काहे की टकटकी लगाये बैठे हो, अब कुछ नहीं आने वाला। वे फिर भी अडवाणी बने बैठे रहते हैं, इस उम्मीद में कि कबहुं दीनदयाल के भनक परेगी कान।
पुराने समय में जब आदमी गृहस्थी की जिम्मेवारियां नहीं निभा पाता था तो उम्र से पहले बाबा हो जाता था। तुलसी बाबा कह गये हैं कि ‘मूड़ मुढाये भये सन्यासी’ या कबीर कहते हैं कि ‘मन ना रंगायो, रंगायो जोगी कपड़ा’। यह स्वरूप बदल कर मजबूरी में बाबा भेष धारण करना होता है। चूंकि मजबूरी में होता था इसलिए मन कहीं और रमा होता था। केशवदास ने कहा ही है कि ‘केशव केशन असि करी, सो कछु ही न कहाय, चन्द्र वदन मन मोहिनी, बाबा कहि कहि जाय’। तब गोदरेज का हेयर डाई नहीं चलता था बरना केशव के बाल भी बाबा रामदेव या श्री श्री की तरह काले होते और वे कविता फविता लिखने की जगह रामरहीम की तरह राक स्टार बन गये होते। राम कथा पढने वाले लोग जानते हैं बाबा धोखा देने वाला भेष ही होता है, रावण सीता हरण के लिए इसी भेष में आया था। तब से ही धोखा देने की यह परम्परा चली आ रही है। पहले यह काम रिटेल में होता था पर अब इसके थोक व्यापारी बन गये हैं जिनकी फैक्टरियां चलने लगी हैं जिन्हें श्रद्धा से आश्रम कहते हैं। श्रद्धा समझते हैं न आप अरे वही आस्था वाली जिस पर हरियाणा में धारा 144 नहीं लग सकती। कभी बुद्ध ने समाज के प्रति विनम्रता सिखाने के लिए अपने शिष्यों को भिक्षु बनने का आदेश दिया था जिससे वे नगरी नगरी द्वारे द्वारे भिक्षा मांग कर पेट भरते थे। बाद में हर मांग कर खाने वाला हरामखोर खुद को बाबा बताने लगा।
देश में लोकतंत्र के मन्दिर संसद भवन पर पहला हमला भाजपा ने ही करवाया था पर तब इस दल का नाम जनसंघ था। सबसे पहले इन बाबाओं पर उसकी ही दिव्यदृष्टि पड़ी और उन्होंने इन्हें जोड़कर गौरक्षा के नाम पर हमला करवा दिया। गुलजारी लाल नन्दा तब गृहमंत्री हुआ करते थे जो गुरुओं के प्रति विशेष प्रेम रखते थे। कहा जाता है कि जब चिमटे त्रिशूलों वाले इन कथित बाबाओं ने संसद के गार्डों पर हमला कर के सदन में घुसने की कोशिश की तो गार्डों को मजबूरन गोली चलाना पड़ी थी जिसमें कई भिक्षुक घायल हो गये थे और जो बाद में काल के गाल में भी समा गये थे। तब से इन बाबाओं की पगडंडी के सहारे भाजपा ने संसद की ओर रास्ता बनाना शुरू कर दिया था क्योंकि उनके लिए राजमार्ग बहुत कठिन था।
मैं मैकदे की राह से होकर गुजर गया
बरना सफर हयात का बेहद तबील था
काँग्रेस अगर एक बाबा की पार्टी है तो भाजपा अनेक बाबाओं की पार्टी है, जिसमें से कुछ बाबाओं को तो वे मार्गदर्शक मण्डल में भी भेज चुके हैं। पंचतंत्र में भी एक कथा आती है जिसमें एक गुरु ने चेलों का शोषण करने के लिए उनके बीच में प्रतियोगिता पैदा कर दी थी व दबाने के लिए एक एक पैर आवंटित कर दिया था। वे कभी एक के काम की तारीफ करते थे तो कभी दूसरे की। एक दिन अपनी पूरी सेवा के बाबजूद जब दूसरे शिष्य को उपेक्षा सहनी पड़ी तो उसने सोते हुए गुरू की दूसरी टांग पर पत्थर पटक दिया। जब दूसरे शिष्य ने उसे आवंटित टांग का यह हाल देखा तो उसने अपने प्रतियोगी को आवंटित टांग का भी वही हाल किया। बहरहाल गुरू जी की दोनों टांगें उनकी कूटनीति में चली गयीं। भाजपा के बाबा भी कभी निरंजन ज्योति के रूप में प्रकट होते हैं, तो कभी साक्षी महाराज के रूप में, कभी उमा भारती के रूप में कभी रामदेव, रामरहीम, आशाराम, वगैरह वगैरह के रूप में।
बाबाओं की पार्टी देश को बाबा बना के छोड़ देगी।